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हिन्दी का आधुनिक विकास और राजभाषा हिंदी की स्थिति

हिन्दी का आधुनिक विकास

हिंदी भाषा का आधुनिक विकास 1850 ईस्वी के बाद शुरू हुआ, जिसे हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भी कहा जाता है. इस काल में हिंदी भाषा और साहित्य ने अनेक पड़ावों से गुजरा, जिसमें गद्य और पद्य दोनों रूपों में विकास हुआ. इस दौरान राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता संग्राम, और संचार साधनों के विकास जैसे सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का हिंदी साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा।
इस काल में राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। इसके लिए शृंगारी ब्रजभाषा की अपेक्षा खड़ी बोली उपयुक्त समझी गई। समय की प्रगति के साथ गद्य और पद्य दोनों रूपों में खड़ी बोली का पर्याप्त विकास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली के दोनों रूपों को सुधारने में महान प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा द्वारा हिन्दी साहित्य की सम्यक संवर्धना की।
विक्रमी संवत् 1800 के उपरान्त भारत में अनेक यूरोपीय जातियाँ व्यापार के लिए आईं। उनके सम्पर्क से यहाँ पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हुआ। विदेशियों ने यहाँ के देशी राजाओं की पारस्परिक फूट से लाभ उठाकर अपने पैर जमाने में सफलता प्राप्त की। जिसके परिणाम-स्वरूप यहां पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई। अंग्रेजों ने यहाँ अपने शासन कार्य को सुचारु रूप से चलाने एवं अपने धर्म-प्रचार के लिए जन-साधारण की भाषा को अपनाया। इस कार्य के लिए गद्य ही अधिक उपयुक्त होती है। इस कारण आधुनिक युग की मुख्य विशेषता गद्य की प्रधानता रही। इस काल में होने वाले मुद्रण कला के आविष्कार ने भाषा-विकास में महान योगदान दिया। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने भी आर्य समाज के ग्रन्थों की रचना राष्ट्रभाषा हिन्दी में की और अंग्रेज मिशनरियों ने भी अपनी प्रचार पुस्तकें हिन्दी गद्य में ही छपवाईं। इस तरह विभिन्न मतों के प्रचार कार्य से भी हिन्दी गद्य का समुचित विकास हुआ।
इस काल के आरम्भ में राजा लक्ष्मण सिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जगन्नाथ दास रत्नाकर, श्रीधर पाठक, रामचंद्र शुक्ल आदि ने ब्रजभाषा में काव्य रचना की। इनके उपरान्त भारतेन्दु जी ने गद्य का समुचित विकास किया और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसी गद्य को प्रांजल रूप प्रदान किया। इसकी सत्प्रेरणाओं से अन्य लेखकों और कवियों ने भी अनेक भाँति की काव्य रचना की। इनमें मैथिलीशरण गुप्त, रामचरित उपाध्याय, नाथूराम शर्मा शंकर, ला. भगवान दीन, रामनरेश त्रिपाठी, जयशंकर प्रसाद, गोपाल शरण सिंह, माखन लाल चतुर्वेदी, अनूप शर्मा, रामकुमार वर्मा, श्याम नारायण पांडेय, दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रभाव से हिन्दी-काव्य में भी स्वच्छन्द (अतुकान्त) छन्दों का प्रचलन हुआ।
इस काल में गद्य-निबन्ध, नाटक-उपन्यास, कहानी, समालोचना, तुलनात्मक आलोचना, साहित्य आदि सभी रूपों का समुचित विकास हुआ।

1800 विक्रम संबत के उपरांत भारत में अनेक यूरोपीय जातियां व्यापार के लिए आईं। उनके संपर्क से यहां पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ना प्रारंभ हुआ। विदेशियों ने यहां के देशी राजाओं की पारस्परिक फूट से लाभ उठाकर अपने पैर जमाने में सफलता प्राप्त की। जिसके परिणाम-स्वरूप यहां पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई। अंग्रेजों ने यहां अपने शासन कार्य को सुचारु रूप से चलाने एवं अपने धर्म-प्रचार के लिए जन-साधारण की भाषा को अपनाया। इस कार्य के लिए गद्य ही अधिक उपयुक्त होती है। इस कारण आधुनिक युग की मुख्य विशेषता गद्य की प्रधानता रही।
इस काल में होने वाले मुद्रण कला के आविष्कार ने भाषा-विकास में महान योगदान दिया। स्वामी दयानंद ने भी आर्य समाज के ग्रंथों की रचना राष्ट्रभाषा हिंदी में की और अंग्रेज़ मिशनरियों ने भी अपनी प्रचार पुस्तकें हिंदी गद्य में ही छपवाईं। इस तरह विभिन्न मतों के प्रचार कार्य से भी हिंदी गद्य का समुचित विकास हुआ।
इस काल में राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। इसके लिए श्रृंगारी ब्रजभाषा की अपेक्षा खड़ी बोली उपयुक्त समझी गई। समय की प्रगति के साथ गद्य और पद्य दोनों रूपों में खड़ी बोली का पर्याप्त विकास हुआ। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र तथा बाबू अयोध्या प्रसाद खत्रीने खड़ी बोली के दोनों रूपों को सुधारने में महान प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा द्वारा हिंदी साहित्य की सम्यक संवर्धना की।
हिंदी भाषा का आधुनिक विकास 18वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुआ, जब हिंदी को गद्य भाषा के रूप में मान्यता मिलने लगी. इस विकास में अंग्रेजों द्वारा स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज और बाद में हिंदी प्रेमियों के राष्ट्रीयता की भावना का महत्वपूर्ण योगदान रहा. खड़ी बोली को गद्य भाषा के रूप में स्वीकार किया गया और इसे ब्रजभाषा से बेहतर माना गया. 

खड़ी बोली का विकास:
19वीं शताब्दी में खड़ी बोली को गद्य के लिए उपयुक्त माना गया और यह धीरे-धीरे ब्रजभाषा से बेहतर रूप से स्वीकार की जाने लगी. 

फोर्ट विलियम कॉलेज का योगदान:
1800 में कलकत्ता में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज ने हिंदी में अच्छे अनुवाद किए, जिससे हिंदी गद्य का रूप बनने लगा. 

राष्ट्रीयता की भावना:
अंग्रेजों के शासन के दौरान, हिंदी प्रेमियों में अपने देश के लिए एक उच्च कोटि की भावना जगी, जिससे हिंदी के विकास को बढ़ावा मिला. 

भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान:
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने खड़ी बोली को सुधारने और हिंदी गद्य को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. 

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान:
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी गद्य को और अधिक प्रांजल रूप दिया और हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

आधुनिक हिंदी कविता का विकास:
आधुनिक हिंदी कविता का विकास विभिन्न आंदोलनों जैसे कि छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता आदि से हुआ है. 

सामाजिक और राजनीतिक बदलाव:
सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों ने हिंदी साहित्य को नई चेतना और विचारों से प्रभावित किया. 

नई भाषा और शैली:
आधुनिक हिंदी साहित्य में नई भाषा, शैली और काव्यरूप विकसित हुए, जिससे यह साहित्य और अधिक समृद्ध हुआ. 

हिन्दी गघ का आधुनिक विकास

हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। भावना के साथ-साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ- साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापेखाने के आते ही साहित्य के संसार में एक नयी क्रांति हुई।
आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। पूरे देश में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया।

हिन्दी पघ का आधुनिक विकास

आधुनिक काल 1850 से हिंदी साहित्य के इस युग को भारत में राष्ट्रीयता के बीज अंकुरित होने लगे थे। स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और जीता गया। छापेखाने का आविष्कार हुआ, आवागमन के साधन आम आदमी के जीवन का हिस्सा बने, जन संचार के विभिन्न साधनों का विकास हुआ, रेडिओ, टी वी व समाचार पत्र हर घर का हिस्सा बने और शिक्षा हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार। इन सब परिस्थितियों का प्रभाव हिंदी साहित्य पर अनिवार्यतः पड़ा। आधुनिक काल का हिंदी पद्य साहित्य पिछली सदी में विकास के अनेक पड़ावों से गुज़रा। जिसमें अनेक विचार धाराओं का बहुत तेज़ी से विकास हुआ। जहाँ काव्य में इसे छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग, नई कविता युग और साठोत्तरी कविता इन नामों से जाना गया, छायावाद से पहले के पद्य को भारतेंदु हरिश्चंद्र युग और महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के दो और युगों में बाँटा गया। इसके विशेष कारण भी हैं।
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राजभाषा हिंदी की स्थिति

हिन्दी भारत की राजभाषा है। भारत के स्वतन्त्र होने के बहुत पहले और स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय ही वह राष्ट्रभाषा की भूमिका का निर्वहन करने लगी थी। गांधी जी कई मंचों पर बोल चुके थे कि भारत के स्वतन्त्र होने पर हिन्दी ही राष्ट्रभाषा होगी।
संविधान सभा ने लम्बी चर्चा के बाद 14 सितम्बर सन् 1949 को हिन्दी को भारत की राजभाषा स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये 14 सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। ध्यातव्य है कि भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा का उल्लेख नहीं है।

यद्यपि भारत एक बहुभाषायी देश था किन्तु बहुत लम्बे काल से हिन्दी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होता था। भक्तिकाल में उत्तर से दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक अनेक सन्तों ने हिन्दी में अपनी रचनाएँ कीं। स्वतंत्रता आन्दोलन में हिन्दी पत्रकारिता ने महान भूमिका अदा की। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, सुब्रह्मण्य भारती आदि अनेकानेक लोगों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का सपना देखा था।
महात्मा गांधी ने 1917 में भरूच में गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जा सकता है क्योंकि यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है; यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूंप में प्रयोग के लिए सक्षम है तथा इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है।

दीर्घकालीन संघर्ष के परिणामस्वरूप संविधान के अनुच्छेद 343 खंड 1 के अनुसार संघ की भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी घोषित की गयी। भारतीय संविधान मे हिन्दी को भी राष्ट्र‌भाषा नही कहा गया है। उसे संघ की राजभाषा या संघ की भाषा धोषित किया गया है। इस घोषणा के बाद राष्ट्रभाषा का तात्पर्य बदल गया। राष्ट्र की जितनी भाषाए है वे सभी राष्ट्र‌भाषाएँ है। सम्पर्क भाषा या राजभाषा या संघ की भाषा है हिन्दी। संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हो गया किन्तु हिन्दी राजभाषा के रूप मे तत्काल लागू नही की गयी। संविधान में ही उल्लेख कर दिया गया था कि राजभाषा के रूप मे अग्रेजी 15 वर्षों तक चलती रहेगी। तत्पश्चात उसके स्थान पर हिन्दी को प्रतिष्ठित कर दिया जाएगा। इस कालावधि मे राष्ट्रपति आदेश के द्वारा राजकीय प्रयोजनो मे से किसी एक के लिए अग्रेजी भाषा के साथ हिन्दी भाषा का तथा भारतीय अंको के अन्तराष्ट्रीय रूप के साथ-साथ देवनागरी रूप के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकेगा। इस अवधि के पश्चात् भी संसद विधि द्वारा अग्रेजी भाषा का ऐसे प्रयोजनो के लिए कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि मे उल्लिखित है। अनुच्छेद 343 (3) की अंतिम पंक्ति इस अवधि को शिथिल कर देती है। इसके दुरूपयोग की संभावना थी जो बाद मे प्रत्यक्ष हुई। अनुच्छेद 344 राजभाषा के लिए आयोग बनाने का प्राविधान करता है। संविधान के प्रारम्भ से, राजभाषा के संबंध मे आयोग-5 वर्ष के उपरांत राष्ट्रपति द्वारा और 10 वर्ष के बाद एक आयोग गठित करेगे निम्नलिखित मामलो पर अपनी सिफारिशें प्रेरित करेगे।
संविधान की धारा 343(1) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपि देवनागरी है। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप (अर्थात 1, 2, 3 आदि) है। किन्तु इसके साथ संविधान में यह भी व्यवस्था की गई कि संघ के कार्यकारी, न्यायिक और वैधानिक प्रयोजनों के लिए 1965 तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहे। तथापि यह प्रावधान किया गया था कि उक्त अवधि के दौरान भी राष्ट्रपति कतिपय विशिष्ट प्रयोजनों के लिए हिन्दी के प्रयोग का प्राधिकार दे सकते हैं।
संसद का कार्य हिन्दी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को सम्बोधित करने की अनुमति दे सकते हैं (संविधान का अनुच्छेद 120)। किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है, और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अन्तर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मन्त्रालय की ओर से जारी किए गए निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा

(1) संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।
(2) खण्ड (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारम्भ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था, परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।
(3) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात्‌, विधि द्वारा
(क) अंग्रेजी भाषा का, या
(ख) अंकों के देवनागरी रूप का,
ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।

अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा

( संविधान के अनुच्छेद 120 के अंतर्गत प्रावधान )
संविधान के अनुच्छेद 120 के अंतर्गत संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा के संबंध में प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 120 के खंड (1) के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि संविधान के भाग-17 में किसी बात के होते हुए भी किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद में कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जायेगा, परंतु यथा स्थिति लोक सभा का अध्यक्ष या राज्य सभा का सभापति अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति सदन में किसी सदस्य को, जो हिंदी में या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है, तो उसे अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकता है।
अनुच्छेद 120 के खंड (2) के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक संविधान के प्रारंभ के समय से पन्द्रह वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात यह अनुच्छेद इस प्रकार प्रभावी होगा।

विधान मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा

( संविधान के अनुच्छेद 210 के अंतर्गत प्रावधान )
अनुच्छेद 210 के खंड (1) के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि संविधान के भाग-17 में किसी बात के होते हुए भी किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधान मंडल में कार्य राज्य की राजभाषा या राजभाषाओं में या हिंदी में या अंग्रेजी में किया जायेगा, किंतु यथा स्थिति, विधान सभा का अध्यक्ष या विधान परिषद का सभापति अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति सदन में किसी भी सदस्य को, जो अपने राज्य की राजभाषा या राजभाषाओं अथवा हिंदी अथवा अंग्रेजी में से किसी भी भाषा में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है, तो उसे अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकता है।
अनुच्छेद 210 के खंड (2) के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि जब तक राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक संविधान के लागू होने के समय से पन्द्रह वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद यह अनुच्छेद प्रभावी होगा।

अनुच्छेद 344 - राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति
राष्ट्रपति, इस संविधान के प्रारंभ से पांच वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात्‌ ऐसे प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति पर, आदेश द्वारा, एक आयोग गठित करेगा जो एक अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जिनको राष्ट्रपति नियुक्त करे और आदेश में आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।
एक समिति गठित की जाएगी जो तीस सदस्यों से मिलकर बनेगी जिनमें से बीस लोक सभा के सदस्य होंगे और दस राज्य सभा के सदस्य होंगे जो क्रमशः लोक सभा के सदस्यों और राज्य सभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे।

उपसंहार

हिन्दी दीर्घकाल से अखण्ड भारत में जन–जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। भक्तिकाल में अनेक सन्त कवियों ने हिन्दी में साहित्य रचना की और लोगों का मार्गदर्शन किया। केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों वल्लभाचार्य, रामानुज, रामानन्द आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिन्दी भाषी राज्यों के कवियों (जैसे—असम के शंकरदेव, महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर व नामदेव (13वीं शताब्दी), गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य आदि) ने हिन्दी को ही अपने धर्म-प्रचार और साहित्य का माध्यम बनाया था। सिखों के ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब में अनेक सन्त कवियों के हिन्दी काव्य संगृहीत हैं। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भूषण, छत्रपति शिवाजी के राजकवि थे। 1816 ई0 में विलियम केरी ने लिखा कि हिन्दी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं, बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।

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