स्त्री विमर्श का आशय एवं उद्देश्य
मनुष्य समाज जिन दो पहियों के बल पर अपनी जीवन यात्राा करता है वे पहिए हैं-पुरुष और महिला नर और नारी। दोनों न केवल एक-दूसरे के पूरक हैं, बल्कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही सम्भव नहीं। इनमें एक श्रम है, दूसरी उस श्रम की प्रेरणा-शक्ति। एक बाहरी परिवेश का नियंता है तो दूसरी आंतरिक और घरेलू मोर्चे की अधिष्ठात्री। लेकिन दोनों के आपसी सम्बन्धों के बीच समानता के संतुलन का अभाव साफ-साफ दिखाई देता है। पुरुष सदैव महिला को अपने अधीन रखता है। सभी महिलाओं को एक समूह के रूप में देखें तो संसार के लगभग सभी देशों में वे समाज का कमजोर हिस्सा रही हैं।
स्त्री विमर्श का आशय
स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, स्त्रीवादी आंदोलन आदि पर विचार विमर्श किया जाए तो इनके मूल में स्त्री के अस्तित्व, मौलिक अधिकार और उसकी मुक्ति के प्रश्न हैं। स्त्री विमर्श हम साहित्य में या मंचों पर करते हैं इसलिए इसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा देना मुश्किल कार्य है। यह पूरी तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आदि संस्थाओं की सोच के परिणाम स्वरूप उनके विचारों की अभिव्यक्ति है।
स्त्री विमर्श में 'विमर्श' शब्द अत्यंत व्यापक है। अतः 'विमर्श' शब्द का व्युक्तिपरक अर्थ विचार-विमर्श, सोचना, समझना, आलोचना करना है।
आज स्त्री विमर्श पूरे विश्व में में एक विमर्श और चर्चा के रूप में व्याप्त हो चुका है, जिसमें स्त्री के सभी पक्षों को पुरुष के सापेक्ष रखकर देखा जाने लगा है। स्त्री विमर्श एक ऐसा संवाद और बहस है जिसमें स्त्री अपने अधिकारों की माँग करती है। इन अधिकारों के अंतर्गत लिंग के आधार पर समानता, निर्णय, अस्तित्व, अस्मिता, स्वतंत्रता और मुक्ति का सवाल भी उभर कर सामने आता है। कहा जाता है कि किसी भी सभ्य समाज और संस्कृति का सही अनुमान उस समाज में रहने वाली स्त्रियों की स्थिति से लगाया जा सकता है। विशेष रूप से जहाँ पुरुष सत्ता और उसका अहंकार विद्यमान हो वहाँ की स्त्रियों की स्थिति एक समान नहीं रहती है।
समाज में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक समानता का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ जिसके परिणामस्वरूप स्त्रियों द्वारा आंदोलन किए गए और इसे ही नारीवाद या स्त्रीवाद कहा गया। इसके लिए अंग्रेजी में Feminism शब्द का प्रयोग किया जाता है। सर्वप्रथम यह आंदोलन ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रारंभ हुआ। 18वीं सदी में यह आंदोलन मानवतावाद और औद्योगिक क्रांति के समय से हुई थी। स्त्रियों को पुरुष से बौद्धिक और शारीरिक स्तर पर कमतर समझा जाता रहा है। समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से धर्मशास्त्रों और कानून में स्त्रियों की पराधीनता और दासता का उल्लेख मिलता है। स्त्रियाँ अपने नाम से संपत्ति नहीं रख सकती थीं और स्त्रियों को संपत्ति का भी अधिकार नहीं था। स्त्रियाँ किसी भी चीज पर अपना अधिकार नहीं जमा सकती थीं। यहाँ तक कि उसे अपने ऊपर और अपने बच्चों पर भी अधिकार जताने का हक नहीं था। उसे अपने निर्णय लेने का भी अधिकार नहीं था। इन सब अधिकारों को प्राप्त करने के लिए महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों के साथ स्त्रियों ने आवाज उठाई और मुक्ति के लिए आंदोलन भी किए।
प्रत्येक देश और प्रत्येक युग में स्त्रियों की स्थिति एक बराबर नहीं थी न ही स्त्रियों की स्थिति प्रत्येक वर्ग में एक समान थी। प्रत्येक देश, राज्य, संस्कृति और वहाँ की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार स्त्रियों पर पुरुष सत्ता हावी रही। जब स्त्रियों ने अपनी समस्याओं पर विचार किया और लिंग के आधार पर सोचना प्रारंभ किया तब उन्हें अपनी दासता और हो रहे अन्याय का ज्ञान हुआ तब जा कर उन्होंने आवाज उठाई और आंदोलन किए, इसीलिए कहा जाता है कि स्त्री विमर्श स्त्रियों के ऊपर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक रूप से मानसिक और शारीरिक दबाव डालने वाली पारंपरिक रूढ़ियों और मान्यताओं के विरोध में उभरा एक वैचारिक आंदोलन है।
जब से स्त्रियों ने अपने सामाजिक और पारिवारिक भूमिकाओं पर सोचना और विचारना आरंभकिया, तब से स्त्री आंदोलन, स्त्री विमर्श और स्त्री अस्मिता से जुड़े संदर्भों पर बहसों की शुरुआत हुई। स्त्री विमर्श को गहराई से समझने के लिए हमें उसके अर्थ और स्वरूप के साथ उसकी परिभाषा को जानना भी आवश्यक है। साथ ही साथ उसके उद्देश्यों को भी जानना आवश्यक है।
हिन्दी कथा साहित्य के स्त्री विमर्श में नारी जीवन की अनेक समस्याएं देखने को मिलती हैं। हिन्दी साहित्य में छायावाद काल से स्त्री-विमर्श का जन्म माना जाता है। महादेवी वर्मा की श्रृंखला की कड़िया नारी सशक्तिकरण का सुन्दर उदाहरण है।
प्रेमचंद से लेकर आज तक अनेक पुरूष लेखकों ने स्त्री समस्या को अपना विषय बनाया लेकिन उस रूप् में नहीं लिखा जिस रूप् में स्वयं महिला लेखिकाओं ने लिखी है। अतः स्त्री-विमर्श की शुरूआती गुंज पश्चिम में देखने को मिला। सन् 1960 ई. के आस-पास नारी सशक्तिकरण जोर पकड़ी जिसमें चार नाम चर्चित हैं। उषा प्रियम्वदा, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी एवं शिवानी आदि लेखिकाओं ने नारी मन की अन्तद्र्वन्द्वों एवं आप बीती घटनाओं को उकरेना शुरू किए और आज स्त्री-विमर्श एक ज्वलंत मुद्दा है।
आठवें दशक तक आते-आते यही विषय एक आन्दोलन का रूप ले लिया जो शुरूआती स्त्री-विमर्श से ज्यादा शक्तिशाली सिद्ध हुआ। आज मैत्रेयी पुष्पा तक आते-आते महिला लेखिकाओं की बाढ़ सी आ गयी जो पितृसत्ता समाज को झकझोर दिया। नारी मुक्ति की गुंज अब देह मुक्ति के रूप में परिलक्षित होने लगा।
हालाकि जमीनी स्तर पर स्त्रीवादी विमर्श हर देश एवं भौगोलिक सीमाओं में अपने स्तर पर सक्रिय रहती हैं और हर क्षेत्र के स्त्रीवादी विमर्श की अपनी खास समस्याएँ होती हैं।
नारीवाद राजनीतिक आंदोलन का एक सामाजिक सिद्धांत है जो स्त्रियों के अनुभवों से जनित है। हालांकि मूल रूप से यह सामाजिक संबंधों से अनुप्रेरित है लेकिन कई स्त्रीवादी विद्वान का मुख्य जोर लैंगिक असमानता और औरतों की अधिकार इत्यादि पर ज्यादा बल देते हैं।
नारी-विमर्श का प्रारंभ कब हुआ, इसके संबंध में विद्वानों में सुनिश्चित एकमतता नहीं है। कुछ लोगों के अनुसार इसका प्रारंभ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ, जब पश्चिम में स्त्रियों के मताधिकार और पाश्चात्य संस्कृति में स्त्रियों के योगदान पर चर्चा होने लगी थी।
हिंदी में नारी-विमर्श ने बीसवीं शताब्दी के लगभग अंत में ज़ोर पकड़ा है और अनेक लेखिकाएं उसमें शामिल हुई हैं। हिंदी में नारी-विमर्श की दृष्टि से कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकें इस प्रकार हैं: बाधाओं के बावजूद नयी औरत (उषा महाजन, 2001), स्त्री-सरोकार (आशाराना व्होरा, 2002), हम सभ्य औरतें (मनीषा, 2002), स्त्रीत्व-विमर्श : समाज और साहित्य (क्षमा शर्मा, 2002), स्वागत है बेटी (विभा देवसरे; 2002), स्त्री-घोष (कुमुद शर्मा, 2002), औरत के लिए औरत (नासिरा शर्मा, 2003), खुली खिड़कियां (मैत्रेयी पुष्पा, 2003), उपनिवेश में स्त्री (प्रभा खेतान,2003), हिंदी साहित्य का आधा इतिहास (सुमन राजे, 2003) इत्यादि। इनके अतिरिक्त हिंदी की अनेक लेखिकाएं नारीवादी होने का दावा कर रही हैं और नारीवादी साहित्य के सृजन में संलग्न हैं। प्रसिद्ध स्त्रीवादी चिंतक कवि गोलेन्द्र पटेल ने नारीवाद के संदर्भ में कहा है कि “स्त्री-दृष्टि में स्त्री-विमर्श वह मानवीय चिंतन धारा है जो स्त्री-चेतना को जागृत कर , उसकी स्वतंत्रता की वकालत करती है , इसे ही स्त्री की भाषा में नारीवाद कहते हैं।
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स्त्री विमर्श का इतिहास
स्त्री-विमर्श का सूत्रापात पश्चिम से माना जाता है। आधुनिक नारीवाद के सिद्धान्त का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रंसीसी में 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित 'सीमोन द बोउवार' की कृति 'द सेंकड सेक्स' थी।
'द सेकेंड सेक्स' ने दर्शन-शास्त्रा, इतिहास, मनोविज्ञान और मानव-शास्त्रा का सहारा लेते हुए यह स्थापित किया कि स्त्रियों का दमन इतिहास और संस्कृति की उपज है और इसे एक प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं समझा जा सकता।
सीमोन द बोऊवार का कथन है- औरत पैदा नहीं होती बना दी जाती है। पाश्चात्य जीवन प (ति में जिस व्यक्ति स्वातन्त्रय का शिलान्यास हुआ तो अमेरिका में स्वतन्त्राता संग्राम, चंस की राज्य क्रांति, नीदरलैंड, इटली, जर्मनी की समाज क्रांतियों ने विश्वव्यापी चेतना को जगाया तो भारत में भी पुरुषों के साथ नारी विचारकों ने नारी-सम्बन्ध न केवल नए सिद्धांत प्रतिपादित किए, बल्कि नारी के यथार्थ को भी प्रस्तुत किया। 1930 में पहली बार स्त्रिायों ने भारतीय स्वतन्त्राता संग्राम में प्रत्यक्षतः भाग लिया, हालांकि गाँधी जी इसके विरुद्ध थे वे चाहते थे कि उनके नमक-आन्दोलन में स्त्रिया, नेपथ्य में रहें और पिकेटिंग, चरखा कातने जैसे नारी सुलभ कार्य संभाल कर पुरुषों को सहयोग दें। किन्तु मारग्रेट कजिन्स, कमला देवी चट्टोपाध्याय, सरोजनी नायडू आदि प्रबु (महिलाओं ने इस बात पर विरोध उनका विरोध किया और अन्त में सफलतापूर्वक सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भाग भी लिया। गाँधी जी तथा अन्य नेताओं के जेल चले जाने पर सरोजिनी नायडू ने ही आन्दोलन का कुशल नेतृत्व किया। इस आंदोलन में सरोजिनी नायडू सहित 800 महिलाएँ बंदी बनाई गई थी। महिलाओं के इस योगदान से प्रभावित होकर ही इसके ठीक एक वर्ष बाद 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन में स्वतन्त्रा भारत के संविधान पर विचार करते हुए स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धान्त को सम्मिलित करने की बात उठाई गई थी। इससे स्त्रियों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आना स्वाभाविक था।
प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने स्त्री को पुरुष से भिन्न कोई लिंग मानने की अपेक्षा यह मानने पर बल दिया है औरत - मर्द के फर्क में न पड़कर मैंने अपने आप आपको हमेशा इंसान सोचा है। शुरु से जानती थी मैं हर चीज के काबिल हूँ। कोई समस्या हो, मर्दों से ज्यादा अच्छी तरह सुलझा सकती हूँ - इसलिए मैंने अपने औरत होने को कभी कमी के पहलू से नहीं सोचा। 28 1829-1956 की सवा सौ साल की लम्बी अवधि में नारी ने अपनी स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए अथक् संघर्ष किया है। हिन्दू कोड बिल का पास हो जाना वास्तव में भारतीय नारी की अपराजेय संघर्ष-शक्ति का सूचक है। जिसका मूल कारण है नारी की कर्मठता, नारी की प्रबलता । यही उसकी सफलता की पहली सीढी भी है।
स्त्री-विमर्श के इतिहास में महिला संगठनों का बहुत बड़ा योगदान है। राष्ट्रीय महिला आयोग तथा राज्य महिला आयोगों का गठन महिलाओं के संगठित प्रयासों की सुखद परिणति माने जा सकते हैं।
अतः इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि महिलाएँ जितनी गति से अधिकार सम्पन्न और आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनेंगी उसी गति से समाज में उनका दर्जा बढ़ेगा तथा उनके प्रति अन्याय एवं शोषण में कमी आएगी।
स्त्री विमर्श का स्वरूप
स्त्री विमर्श दो शब्दों से मिलकर बना है- 'स्त्री' और 'विमर्श'। स्त्री का अर्थ महिला, नारी, औरत, लड़की मतलब लिंग के आधार पर स्त्री होना। विमर्श का अर्थ होता है बहस, संवाद, वार्तालाप या विचारों का आदान-प्रदान। अतः स्त्रियों को लेकर होने वाले बहस को हम स्त्री विमर्श कहते हैं। इन विमर्शों के माध्यम से स्त्री विमर्श का अर्थ स्त्री की परंपरागत छवि या पहचान से एक नई स्त्री छवि या पहचान का निर्माण करना है। स्त्री विमर्श एक प्रकार से रूढ़ परंपराओं, मान्यताओं के प्रति असंतोष और उससे मुक्ति का स्वर है। पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे नैतिक मापदंडों, मूल्यों व अंतर्विरोधों को समझने व पहचानने की गहरी अंतर्दृष्टि है।
कई वर्षों से चली आ रही पुरुषों की दासता के विरोध में स्त्री के अधिकारों को लेकर उठायी गयी आवाज को स्त्री विमर्श कहते हैं। परंपराओं से इस समाज व्यवस्था ने पुरुषों को जो छूट प्रदान की है उनमें से कुछ स्त्रियों ने अपने लिए भी वही छूट माँगनी प्रारंभ कर दी, जिसमें प्रमुख रूप से लैंगिक समानता, भेदभाव न होना और घरेलू हिंसा का विरोध, यौन उत्पीड़न का विरोध और समान वेतन का अधिकार जैसे अनेक मुद्दे शामिल हैं।
आज समाज में स्त्रियाँ केवल जनसंख्या का हिस्सा बनकर गिनती में नहीं रहना चाहती बल्कि वे भी पुरुषों की तरह समाज और परिवार में मनुष्य बनकर केन्द्र में आना चाहती हैं और इसके लिए वे अपने अस्तित्व की लड़ाई आरंभ कर चुकी हैं। इस संघर्ष और लड़ाई को स्त्री विमर्श का नाम दे दिया गया है। इस संघर्ष में स्त्री से जुड़े वे सभी मुद्दे शामिल हैं जो वर्षों से इन्हें समाज में लिंग के आधार पर झेलने पड़े हैं। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियों ने पुरुषों की तरह अपने अधिकारों की माँग करनी प्रारंभ कर दी है और यह माँग एक प्रकार के सामाजिक आंदोलन के रूप में उभरी है। यह आंदोलन लैंगिक भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है। स्त्री विमर्श में मध्यवर्गीय स्त्री का पूरा संघर्ष प्रमुख रूप से लैंगिक समानता, शारीरिक शोषण, सामाजिक स्वतंत्रता से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक सिमटा हुआ है। इस धारा की उत्पत्ति मुख्यतः पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरोध के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है। परन्तु स्त्री विमर्श अपने सवालों के कटघरे में पुरुष को नहीं रखती बल्कि समस्त पुरुष व्यवस्था को खड़ा करती है। अतः कहा जा सकता है कि स्त्री विमर्श का स्वरूप पितृसत्ता के इर्द-गिर्द ही खड़ा रहता है।
स्त्री विमर्श का उद्देश्य
वैश्विक स्तर पर स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए अनेक सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन हुए हैं। सामाजिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप स्त्रियों में जागृति आई, वे शिक्षित हुईं और धीरे-धीरे स्त्रियों में साहस भी आया है। अब स्त्रियाँ घर से बाहर निकलकर पढ़ने-लिखने, नौकरी या अन्य कार्य करने लगीं और अपने खिलाफ हो रहे अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठानी भी उन्होंने सीख ली। इसके बावजूद कहीं-कहीं स्त्रियाँ आज भी पितृसत्ता के चंगुल से बाहर नहीं निकल सकी हैं। वे इसी सत्ता में दबकर जीवन जी रही हैं और अपने अनुभवों को लेखन कार्य में कथा, कहानी, कविता में पिरो रही हैं। कुछ स्त्रियाँ मंचों पर भाषण देकर महिलाओं के भीतर चेतना और जागृति लाने का कार्य भी करती रही हैं। परिणामस्वरूप यही स्त्री विमर्श के रूप में आज वैश्विक स्तर पर साहित्यक मंचों, सोशल मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, सिनेमा और समाज सेवी संस्थाओं के माध्यम से अधिक विकसित हुआ है।
यदि विचार किया जाए तो स्त्री विमर्श का मुख्य मुद्दा लिंग भेद के कारण असमानता और अधिकारों से वंचित होने का कारण रहा है। लिंग भेद के चलते पुरुष स्वयं को वर्चस्ववादी और अधिक शक्ति सम्पन्न मानता है। बाल्यावस्था से ही लड़की के भीतर लड़कियों वाले गुण थोप दिये जाते हैं इसीलिए लड़कियाँ वैसी (लड़कियों जैसी) बनती चली जाती हैं। सीमोन द बोउवार ने ठीक ही कहा है- 'स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि स्त्री बनाई जाती है।' इसी आधार पर स्त्री को स्त्री और पुरुष को पुरुष जैसे सामाजिक और व्यवहारिक शिक्षा दी जाती है।
स्त्री विमर्श में 'स्त्री' को लेकर बहस क्यों होता आया है? और इसका क्या उद्देश्य है? इस पर विचार करें तो हम पाते हैं कि स्त्री को घर, परिवार और समाज में अपने अस्तित्व की पहचान करवानी है। उनके भीतर चेतना, साहस और आत्मविश्वास पैदा करना अत्यंत आवश्यक है। आज का दौर परिवर्तन का दौर है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति एवं प्रतिभा को पहचानने और प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। सभी स्त्रियों में यह चेतना लानी है और लिंग भेद को जड़ से मिटाना है। क्योंकि स्त्री और पुरुष दोनों की अपनी अलग पहचान और उनका अलग अस्तित्व होता है। दोनों में कार्य करने की समान योग्यता भी होती है। फिर भी स्त्रियों को कमजोर समझकर दबाया जाता है और उसे आज भी मनुष्य नहीं बल्कि एक वस्तु के रूप में समझा जाता है। इन्हीं मुद्दों को केन्द्र में रखकर चर्चा करें तो स्त्री विमर्श के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं:
• स्त्री को मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित करना,
• शोषण और उत्पीड़न के विरोध में संघर्ष करना,
• स्त्री संबंधी विभिन्न समस्याओं पर विचार विमर्श करना,
• स्त्री को अपने अस्तित्व और अस्मिता की पहचान करवाना,
• मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाना,
• मानसिक और शारीरिक शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना,
• साहित्य, मीडिया और सिनेमा में स्त्री संबंधी मुद्दों से जागृति लाना,
• स्त्री को अपने भीतर सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक रूप से मानसिक परिवर्तन लाना।
कुल मिलाकर सभी भारतीय भाषाओं में कम-अधिक मात्रा में 'स्त्री-विमर्श' पर साहित्य लिखा जा रहा है। इन समूचे दौर में स्त्री लेखिकाओं का नया वंश विकसित हुआ है। यद्यपि अपेक्षाकृत महिलाओं ने इस क्षेत्र में बाद में पहल की, किंतु जब उसे अपनाया तो वे पूरी तरह छा गयी। अतः उन्हें बेदखल करना असंभव रहा। प्रारंभिक लेखिकाओं में उशा देवी मित्रा, शिवरानी देवी, कौशिल्या अश्क, सुमित्रा कुमारी सिंहा, चंद्रकिरण सोनरिक्सा, महादेवी वर्मा के नाम लिए जा सकते हैं। जिनकी मूल चेतना और चिंताएँ स्त्री को लेकर थीं। इनके पश्चात उशा प्रियंवदा, मन्नू भंडारी, दीप्ति खंडेलवाल, मृदुला गर्ग, माणिका मोहिनी, मंजुल भगत, कृष्णा अग्निहोत्री, सूर्यबाला, कृष्णा सोबती, निरुपमा सोबती, चित्रा मुद्गल, राजी सेठ, प्रभा खेतान, नासिरा शर्मा, नमिता सिंह, सुधा अरोड़ा, मैत्रेयी पुष्पा एवं ममता कालिया आदि लेखिकाओं ने भी अपनी रचनाओं में बडी सजगता से स्त्री-विमर्श को उभारने का प्रयास किया हैं।
नारीवादी सिद्धांतों का उद्देश्य लैंगिक असमानता की प्रकृति एवं कारणों को समझना तथा इसके फलस्वरूप पैदा होने वाले लैंगिक भेदभाव की राजनीति और शक्ति संतुलन के सिद्धांतो पर इसके असर की व्याख्या करना है। स्त्री विमर्श संबंधी राजनैतिक प्रचारों का जोर प्रजनन संबंधी अधिकार, घरेलू हिंसा, मातृत्व अवकाश, समान वेतन संबंधी अधिकार, यौन उत्पीड़न, भेदभाव एवं यौन हिंसा पर रहता है।
स्त्रीवादी विमर्श संबंधी आदर्श का मूल कथ्य यही रहता है कि कानूनी अधिकारों का आधार लिंग न बने। आधुनिक स्त्रीवादी विमर्श की मुख्य आलोचना हमेशा से यही रही है कि इसके सिद्धांत एवं दर्शन मुख्य रूप से पश्चिमी मूल्यों एवं दर्शन पर आधारित रहे हैं।
निष्कर्ष
स्त्री-विमर्श में स्त्री स्वतंत्रता को आवश्यक माना है। स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक, राजनीतिक तथा परिवारिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि दैहिक और मानसिक स्वतंत्रता भी है। स्वतंत्रता चाहिए उस रुढिवादी समाज के बंधनों से जो स्त्री के भीतर की विद्रोह आवाज सुनने से ही इनकार करता है। स्वतंत्रता चाहिए सोच-विचार की। स्वतंत्रता का मूल अभिप्राय है 'निर्णय की स्वतंत्रता' और स्त्री स्वतंत्रता का रुप क्या होगा, यह स्वयं स्त्रियों को ही तय करना है, यह निर्णय कुछ विशिष्ट महिलाओं द्वारा नहीं लिया जा सकता हैं। कहा जा सकता है कि महिला-लेखन में स्त्री-विमर्श स्त्री की दृष्टि से देखा गया और अभिव्यक्त किया गया हैं।
भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति और नियति की व्याख्या करना आज के दौर में और कठिन हो गया है। स्त्री विमर्श उत्तर आधुनिक युग में एक सशक्त विमर्श के रूप में सामने आया है जिसने सदियों से शोषित हो रही स्त्री को चर्चा के केन्द्र में ला खड़ा किया है। स्त्री विमर्श की गहराई से पड़ताल करें तो नारी मुक्ति के साथ-साथ इसमें नारी की अस्मिता, चेतना व स्वाभिमान आदि भी शामिल है। साहित्य में स्त्री विमर्श को लेकर अनेक लेखक, लेखिकाओं और आलोचकों ने अलग अलग तरह से अपने विचारों को स्त्री विमर्श के रूप में अपनी पुस्तकों में अभिव्यक्त किया है। साहित्य में स्त्री विमर्श को लेकर विवाद भी रहा है। इस संदर्भ में सभी विद्वानों और विचारकों का मत एक समान नहीं है। स्त्रीवादी चिंतन की दृष्टि से पितृसत्तात्मक व्यवस्था, लिंग भेद, स्त्री-पुरुष के मध्य संरचनात्मक असमानता इसका मूल आधार है।
साहित्य में स्त्री विमर्श का अर्थ मात्र स्त्री या पुरुष द्वारा स्त्री के ही विषय में स्त्री विषयक मुद्दों में लिखा गया साहित्य नहीं है, बल्कि स्त्री जीवन की सामाजिक, पारिवारिक समस्याओं, विडंबनाओं को अभिव्यक्त करना और उस पर विचार स्त्री विमर्श है। साहित्य में स्त्री विमर्श को स्त्री विषयक आघात या स्त्री-पुरुष टकराव या स्त्रीवाद तक सीमित करना गलत समझदारी है। कुछ आलोचक स्त्री लेखन को पुरुष लेखन के समानान्तर चलने वाली धारा मानते हैं।
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