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काव्य लक्षण , काव्य हेतु , काव्य प्रयोजन , काव्य प्रकार


साहित्य के विशाल संसार में काव्य का स्थान उच्च माना गया है। काव्य वह माध्यम है जिसके द्वारा मानव हृदय की सूक्ष्म भावनाएँ, अनुभूतियाँ और विचार सौंदर्यपूर्ण भाषा में अभिव्यक्त होते हैं। यह केवल शब्दों का संयोग नहीं, बल्कि हृदय की संवेदना और कल्पना की सजीव अभिव्यक्ति है। काव्य मनुष्य के हृदय को स्पर्श करता है, उसे आनन्द, प्रेरणा और जीवन-दर्शन प्रदान करता है।
काव्य की पूर्णता उसके लक्षण, हेतु, प्रयोजन और प्रकार के समुचित ज्ञान से होती है। काव्य लक्षण यह बताते हैं कि किसी रचना को काव्य कहलाने योग्य बनाने वाले तत्व कौन-से हैं। काव्य हेतु उस प्रेरणा को व्यक्त करता है जो कवि को रचना के लिए प्रेरित करती है। काव्य प्रयोजन काव्य का उद्देश्य बताता है — अर्थात् कवि क्यों रचना करता है और वह समाज को क्या देना चाहता है। वहीं काव्य प्रकार काव्य की विविध विधाओं का परिचय कराता है, जिनसे साहित्य में विविधता और विस्तार आता है।
इस प्रकार, काव्य केवल भावनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन के सत्य, सौंदर्य और नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति है। काव्य मनुष्य को संवेदनशील, सृजनशील और विचारशील बनाता है। अतः काव्य के लक्षण, हेतु, प्रयोजन और प्रकार का अध्ययन साहित्यिक समझ को गहराई देता है और हमें यह बोध कराता है कि काव्य मानव जीवन का दर्पण है, जो समाज और व्यक्ति दोनों के मनोविश्व को आलोकित करता है। काव्य लक्षण , काव्य हेतु , काव्य प्रकार , काव्य प्रयोजन आदि निम्नलिखित हैं : - 

काव्य लक्षण

काव्य लक्षण उन विशेषताओं या गुणों का समूह है जो किसी रचना को काव्य घोषित करने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। दूसरे शब्दों में, काव्य लक्षण का अर्थ ही काव्य की परिभाषा है, जो किसी रचना को काव्य के रूप में परिभाषित करने के लिए ज़रूरी गुण और विशेषताएं बताती हैं। प्रमुख लक्षणों में दोष रहित होना, गुणों से युक्त होना, और रसात्मकता (रस से युक्त) होना शामिल है। 
काव्य साहित्य का वह स्वरूप है जिसमें भावनाओं, अनुभूतियों और कल्पनाओं का सुंदर और प्रभावशाली शब्दों में संयोजन होता है। यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि हृदय की संवेदनाओं की मधुर अभिव्यक्ति है। काव्य का उद्देश्य पाठक या श्रोता के मन में आनंद, प्रेरणा और रस की अनुभूति उत्पन्न करना है। आचार्यों ने काव्य की अनेक परिभाषाएँ दी हैं — मम्मट के अनुसार “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य कहलाता है। दंडी ने कहा “शब्दार्थो सहितौ काव्यम्” यानी शब्द और अर्थ का सुसंगठित मेल काव्य का लक्षण है।
काव्य का प्रमुख लक्षण रस है। रस ही वह तत्व है जो काव्य को जीवन प्रदान करता है। इसके माध्यम से कवि मानव जीवन के सुख-दुःख, प्रेम, करुणा, शौर्य आदि भावों को व्यक्त करता है। भरतमुनि ने नौ रसों का उल्लेख किया है जैसे — शृंगार, वीर, करुण, हास्य आदि। इसके अतिरिक्त अलंकार और कल्पना भी काव्य के महत्त्वपूर्ण लक्षण हैं। अलंकार काव्य को सौंदर्य प्रदान करते हैं, जबकि कल्पना कवि की रचनात्मकता का प्रतीक होती है।
काव्य की भाषा मधुर, सरल और भावानुकूल होनी चाहिए ताकि उसके अर्थ और संवेदना स्पष्ट रूप से प्रकट हों। जब शब्द, अर्थ, रस, अलंकार और कल्पना का सुंदर संयोजन होता है, तब एक श्रेष्ठ काव्य की रचना होती है। अतः कहा जा सकता है कि काव्य वह कला है जो मानव हृदय की गहराइयों में उतरकर सौंदर्य, संवेदना और सच्चाई का संचार करती है तथा पाठक को रसानुभूति प्रदान करती है।

काव्य लक्षण की प्रमुख विशेषताएँ

दोष रहित होना: काव्य में व्याकरणिक या अर्थ संबंधी दोष नहीं होने चाहिए।
गुणयुक्त होना: काव्य में प्रसाद, माधुर्य और ओज जैसे गुणों का होना आवश्यक है, जो रस के धर्म माने जाते हैं।
रसात्मकता: काव्य का उद्देश्य पाठक/दर्शक को रस का अनुभव कराना है, इसलिए उसमें रस और भाव की प्रधानता होनी चाहिए।
अलंकारयुक्त होना: अलंकारों का प्रयोग काव्य में सौंदर्य और चमत्कार उत्पन्न करता है।
रमणीयता: काव्य का अर्थ रमणीय (सुंदर और मनोहारी) होना चाहिए, ताकि पाठक उसका आनंद ले सकें। 
विभिन्न आचार्यों द्वारा दिए गए लक्षण
आचार्य भामह: "शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्" (दोष रहित और गुण-युक्त शब्द और अर्थ काव्य हैं)।
आचार्य विश्वनाथ: "वाक्यं रसात्मकं काव्यं" (रसात्मक वाक्य ही काव्य है)।
आचार्य जगन्नाथ: "रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्" (रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है)।

काव्य हेतु

काव्य-हेतु का अर्थ है काव्य-रचना के कारण या वे सामर्थ्य जो किसी व्यक्ति में काव्य रचने की क्षमता उत्पन्न करते हैं। इसके तीन प्रमुख कारण माने जाते हैं: प्रतिभा (सहज शक्ति), व्युत्पत्ति (ज्ञान और निपुणता) और अभ्यास (निरंतर प्रयास)। 
काव्य हेतु से अभिप्राय है — वह प्रेरणा या कारण जिसके कारण कवि काव्य की रचना करता है। प्रत्येक काव्य के पीछे कोई न कोई उद्देश्य या प्रेरक तत्व अवश्य होता है, जो कवि के मन में सृजन की भावना जगाता है। यह प्रेरणा कभी आंतरिक होती है, तो कभी बाह्य। आंतरिक प्रेरणा कवि की भावनाओं, अनुभवों, संवेदनाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न होती है, जबकि बाह्य प्रेरणा समाज, प्रकृति, धर्म या किसी विशेष घटना से प्राप्त होती है।
आचार्यों ने काव्य हेतु के विविध रूप बताए हैं। मम्मट के अनुसार काव्य की उत्पत्ति के तीन प्रमुख हेतु हैं — कवि की प्रतिभा, रसास्वादन की भावना, और सृजन की प्रेरणा। कवि की प्रतिभा वह शक्ति है जो साधारण विषयों में भी सौंदर्य देख लेती है। रसास्वादन की भावना से कवि अपने अनुभवों को मधुर रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे पाठक के हृदय में आनन्द उत्पन्न होता है। सृजन की प्रेरणा से कवि अपने विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिए बाध्य होता है।
कभी काव्य हेतु भक्ति होता है, जैसा कि तुलसीदास और सूरदास के काव्य में दिखाई देता है; कभी देशभक्ति, जैसा मैथिलीशरण गुप्त या सुभद्रा कुमारी चौहान के काव्य में; और कभी प्रकृति प्रेम, जैसा जयशंकर प्रसाद के काव्य में। अतः कहा जा सकता है कि काव्य हेतु वह सजीव प्रेरणा है जो कवि के मन में भावनाओं की ज्वाला प्रज्वलित करती है और शब्दों को काव्य का रूप देती है। यही काव्य की आत्मा और सृजन का मूल कारण है।

काव्य-हेतु के तीन प्रमुख कारण

प्रतिभा: इसे कवि की स्वाभाविक या जन्मजात शक्ति माना जाता है। यह वह प्रज्ञा है जो नए विचारों को जन्म देती है और काव्य सृजन का आधार है।
व्युत्पत्ति: इसका अर्थ है बहुज्ञता या ज्ञान। इसमें शास्त्रों और लोक व्यवहार का गहन ज्ञान शामिल है, जो कविता में व्यापकता और उत्कृष्टता लाता है।
अभ्यास: यह निरंतर प्रयास और अभ्यास है जो रचना को परिपक्व बनाता है। अभ्यास के द्वारा कवि अपनी प्रतिभा और व्युत्पत्ति का और निखार कर सकता है। 
भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार, ये तीनों हेतु एक-दूसरे के पूरक हैं और कवि में काव्य-रचना की पूर्ण सामर्थ्य उत्पन्न करते हैं। इनमें प्रतिभा को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि व्युत्पत्ति और अभ्यास उसे सहायक होते हैं। 

काव्य प्रयोजन

काव्य प्रयोजन का अर्थ है काव्य रचना का उद्देश्य या उससे मिलने वाला फल, जैसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, यश, आनंद, व्यवहार ज्ञान और लोक मंगल। भारतीय काव्यशास्त्र में, कवि और पाठक दोनों के दृष्टिकोण से काव्य प्रयोजन पर विस्तार से विचार किया गया है, और मम्मट ने इसके छह प्रमुख प्रयोजनों की चर्चा की है। 
काव्य प्रयोजन का अर्थ है — काव्य रचना का उद्देश्य या लक्ष्य। प्रत्येक काव्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखा जाता, बल्कि उसके पीछे कोई गहरा भाव, संदेश या प्रेरणा छिपी होती है। कवि अपने काव्य के माध्यम से समाज, जीवन, प्रकृति और मानवीय भावनाओं के विविध रूपों को व्यक्त करता है। इस प्रकार काव्य का प्रयोजन होता है — पाठक के हृदय में संवेदना, सौंदर्य-बोध और नैतिक चेतना उत्पन्न करना।
प्राचीन आचार्यों ने काव्य प्रयोजन के विविध रूप बताए हैं। मम्मटाचार्य ने कहा कि “काव्य का प्रयोजन त्रिविध है — श्रवण का आनन्द, लोक-शिक्षा और कीर्ति की प्राप्ति।” अर्थात् काव्य से मनुष्य को मानसिक आनन्द प्राप्त होता है, उसे जीवन के आदर्शों की शिक्षा मिलती है और कवि को यश प्राप्त होता है। आचार्य विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में कहा है कि काव्य का सर्वोच्च प्रयोजन “लोकमंगल” है, यानी समाज का कल्याण।
काव्य का प्रयोजन भिन्न-भिन्न कवियों के अनुसार भी बदलता है। भक्तिकालीन कवि अपने काव्य के माध्यम से भक्ति और ईश्वर-प्रेम का प्रचार करते हैं; रीतिकालीन कवि शृंगार और सौंदर्य के माध्यम से जीवन में रस का संचार करते हैं; जबकि आधुनिक कवि समाज-सुधार, देशप्रेम और मानवता का संदेश देते हैं। अतः कहा जा सकता है कि काव्य का प्रयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देना, भावनाओं को जागृत करना और समाज में सत्य, सौंदर्य तथा करुणा की स्थापना करना है। यही काव्य की सर्वोच्च सार्थकता और उसकी अमरता का कारण है।

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काव्य प्रयोजन के विभिन्न पक्ष

कवि का उद्देश्य: कवि काव्य रचना क्यों करता है और उससे क्या प्राप्त करना चाहता है?
यश/ख्याति: कवि यश और कीर्ति की कामना करता है (आचार्य रुद्रट और भिखारी दास द्वारा महत्वपूर्ण माना गया)।
धन/अर्थ: धन प्राप्त करना एक प्रयोजन हो सकता है (आदिकाल में अधिक प्रचलित)।
धर्म और मोक्ष: धर्म और मोक्ष की प्राप्ति भी एक उद्देश्य है।
कांता-सम्मत उपदेश: मम्मट के अनुसार, पत्नी की तरह मधुर उपदेश देना भी एक प्रयोजन है।
आत्म-शांति/आनंद: मन की शांति और आनंद की प्राप्ति (कुंतक और तुलसीदास द्वारा महत्वपूर्ण माना गया)।
पाठक का उद्देश्य: पाठक कविता क्यों पढ़ता है?
रसानंद की प्राप्ति: काव्य का आनंद लेना एक प्रमुख प्रयोजन है। यह पाठक को ब्रह्म-सुख के समान आनंद प्रदान करता है (आचार्य विश्वनाथ और आनंदवर्धन द्वारा)।
लोक व्यवहार का ज्ञान: काव्य के माध्यम से जीवन के व्यवहारिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।
अमंगल का नाश: दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्ति पाना भी एक प्रयोजन है (मम्मट द्वारा)।
ज्ञान का विस्तार और उपदेश: ज्ञान में वृद्धि करना और उपदेश प्राप्त करना।
सामाजिक उद्देश्य:
लोक मंगल/लोकहित: समाज का कल्याण और हित (महादेवी वर्मा और डॉ. नगेंद्र द्वारा)।
जागरूकता: जनता को जागरूक करना और सामाजिक बुराइयों का खंडन करना (भक्ति काल में संत कवियों द्वारा)।
राष्ट्र-जागरण: राष्ट्रीय चेतना और गौरव को जागृत करना (कालिदास और तुलसीदास के संदर्भ में)।
आचार्य मम्मट के काव्य प्रयोजन
मम्मट ने कवि के लिए काव्य के छह प्रयोजन बताए हैं: 
यश
अर्थ (धन)
लोक व्यवहार (सार्वजनिक ज्ञान)
अिष्ट का निवारण (अनिष्ट का नाश)
परम शिवतरक्षति (अत्यंत कल्याण)
कांता-सम्मत उपदेश 

काव्य प्रकार

काव्य मुख्य रूप से दृश्य और श्रव्य दो प्रकार के होते हैं। दृश्य काव्य वह है जिसे देखा जा सके (जैसे नाटक), जबकि श्रव्य काव्य वह है जिसे सुना जा सके। श्रव्य काव्य के दो प्रमुख उपभेद हैं: गद्य और पद्य। पद्य काव्य को आगे महाकाव्य और खंडकाव्य जैसे प्रकारों में विभाजित किया जाता है। 
काव्य प्रकार से अभिप्राय है — काव्य के विभिन्न रूप या श्रेणियाँ। काव्य को उसके रूप, विषयवस्तु और प्रस्तुति शैली के आधार पर अनेक प्रकारों में विभाजित किया गया है। सामान्यतः काव्य के दो प्रमुख रूप माने गए हैं — गद्य काव्य और पद्य काव्य। पद्य काव्य वह होता है जिसमें छंद, लय और तुक का प्रयोग होता है, जैसे — कविता, गीत, दोहा, सवैया आदि। गद्य काव्य वह है जिसमें विचारों की अभिव्यक्ति बिना छंद के होती है, जैसे — निबंध, कहानी, उपन्यास या लघुकथा।
पद्य काव्य को उसकी भावनाओं के आधार पर भी विभाजित किया गया है। इसमें मुख्य रूप से महाकाव्य, खण्डकाव्य, गीतिकाव्य, नाटक, और प्रबंध काव्य प्रमुख हैं। महाकाव्य में किसी वीर पुरुष या ऐतिहासिक घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन होता है, जैसे रामचरितमानस या महाभारत। खण्डकाव्य किसी एक प्रसंग या घटना पर आधारित होता है, जबकि गीतिकाव्य में कवि अपने व्यक्तिगत भावों, प्रेम, करुणा या भक्ति की अनुभूति को व्यक्त करता है।
भावों के आधार पर काव्य को शृंगार, वीर, करुण, हास्य, भक्ति, देशभक्ति आदि रसात्मक प्रकारों में भी बाँटा गया है। प्रत्येक काव्य प्रकार अपने उद्देश्य, भाषा और शैली के अनुसार विशिष्ट होता है। अतः कहा जा सकता है कि काव्य के प्रकार उसकी विविधता और व्यापकता को दर्शाते हैं। विभिन्न काव्य रूपों के माध्यम से कवि मानव जीवन के हर पहलू को प्रकट करता है, जिससे साहित्य न केवल मनोरंजन का साधन बनता है, बल्कि जीवन का दर्पण भी बन जाता है।

दृश्य और श्रव्य काव्य

दृश्य काव्य: अभिनय के माध्यम से देखा जाने वाला काव्य, जैसे नाटक और प्रहसन।
श्रव्य काव्य: जिसे सुनकर आनंद लिया जाता है, जैसे उपन्यास और कहानी। 
श्रव्य काव्य के भेद
गद्य और पद्य
गद्य: वाक्य-विन्यास में लिखा गया, जैसे उपन्यास और कहानियाँ।
पद्य: छंद और लय में लिखा गया, जैसे महाकाव्य और खंडकाव्य। 
पद्य काव्य के प्रमुख भेद
महाकाव्य: जीवन की संपूर्ण कथा का विस्तृत वर्णन, जैसे 'रामचरितमानस' या 'रघुवंश'।
खंडकाव्य: जीवन की किसी एक घटना या अंश पर आधारित रचना, जैसे 'पंचवटी' या 'मधुशाला'। 
काव्य के अन्य वर्गीकरण
ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य और चित्र: यह वर्गीकरण काव्य में निहित अर्थ की प्रधानता के आधार पर किया गया है।
ध्वनि काव्य: जहाँ छिपा हुआ अर्थ (व्यंग्य) मुख्य हो।
गुणीभूत व्यंग्य: जहाँ व्यंग्य अर्थ गौण हो।
चित्र काव्य: जहाँ व्यंग्य अर्थ न हो और चमत्कार केवल अलंकार या शब्द-कौशल से हो। 

निष्कर्ष 

काव्य मानव हृदय की गहनतम भावनाओं की सजीव अभिव्यक्ति है। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि संवेदना, कल्पना और सौंदर्य का अद्भुत संगम है। काव्य वह माध्यम है जिसके द्वारा कवि अपने अनुभवों, विचारों और भावनाओं को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। संस्कृत और हिंदी के आचार्यों ने काव्य को विभिन्न दृष्टियों से परिभाषित किया है। भरतमुनि ने इसे रसात्मक कहा, जबकि मम्मटाचार्य के अनुसार “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” अर्थात् जिसमें रस का अनुभव हो वही काव्य है। शब्द और अर्थ का सुंदर संयोग, भावों की गहराई, लयात्मकता और कल्पना – ये सभी काव्य के लक्षण माने गए हैं। काव्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन के सत्य और सौंदर्य की अनुभूति कराना है।
काव्य हेतु उस प्रेरणा को कहा जाता है जो कवि को सृजन की ओर प्रवृत्त करती है। यह प्रेरणा कभी भक्ति से, कभी प्रेम से, कभी करुणा से और कभी देशभक्ति या समाज सुधार की भावना से उत्पन्न होती है। तुलसीदास के काव्य का हेतु भक्ति है, दिनकर के काव्य का हेतु राष्ट्रप्रेम और संघर्ष है, जबकि महादेवी वर्मा के काव्य का हेतु करुणा और संवेदना है। कवि जब अपने हृदय के भावों को शब्द देता है, तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी रचता है।
काव्य प्रयोजन अर्थात काव्य का उद्देश्य, जो उसकी आत्मा है। काव्य का प्रयोजन केवल रंजन नहीं, बल्कि शिक्षण और प्रेरणा देना भी है। एक सच्चा काव्य पाठक के मन को आनंदित करने के साथ-साथ उसे विचारशील भी बनाता है। काव्य के माध्यम से समाज में नैतिकता, मानवता और सौंदर्य-बोध का प्रसार होता है। यह मनुष्य को उच्च आदर्शों की ओर ले जाता है और जीवन के प्रति उसकी दृष्टि को व्यापक बनाता है।
काव्य के प्रकार उसकी विविधता और व्यापकता को दर्शाते हैं। रूप के आधार पर यह गद्य और पद्य काव्य में विभाजित है, जबकि भाव के आधार पर शृंगार, वीर, करुण, हास्य, भक्ति आदि रसात्मक काव्य इसके प्रमुख रूप हैं। भक्ति काव्य में ईश्वर प्रेम झलकता है, वीर काव्य में पराक्रम की भावना, और शृंगार काव्य में सौंदर्य का आकर्षण। इन सबके माध्यम से काव्य मानव जीवन के हर रंग को अभिव्यक्त करता है।
अंततः कहा जा सकता है कि काव्य मनुष्य के हृदय की वाणी है। इसमें सौंदर्य, सत्य और भावना का अद्भुत संगम होता है जो पाठक के मन को छू जाता है। काव्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है, उसकी आत्मा को पवित्र करता है और समाज में संस्कार, प्रेम और करुणा का प्रसार करता है। यही कारण है कि काव्य को साहित्य का सर्वोत्तम रूप और मानवता की आत्मा कहा गया है।
धन्यवाद ! 



आपको हमारा ये लेख (आर्टिकल) “ काव्य लक्षण , काव्य हेतु , काव्य प्रयोजन , काव्य प्रकार ” कैसा लगा , अपनी राय लिखें और यदि आप चाहते हैं कि हम किसी अन्य विषय पर भी निबंध , कविता या लेख लिखे तो आप कमेंट के द्वारा हमें अपने सुझाव व विषय दे सकते हैं।
धन्यवाद ।

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