सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण की समीक्षा
सन् 1857 की क्रांति और पुनर्जागरण भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। क्रांति, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ विद्रोह था, जबकि पुनर्जागरण भारतीय समाज और संस्कृति में एक नई जागृति थी। दोनों ही समय काल में महत्वपूर्ण बदलावों के प्रतीक हैं। 1857 की क्रांति भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह था। इसे भारतीय इतिहास में 'पहला स्वतंत्रता संग्राम' भी माना जाता है और पुनर्जागरण 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज और संस्कृति में एक नई जागृति थी। यह एक ऐसा समय था जब भारतीय लोग पश्चिमी शिक्षा और विचारों से प्रभावित हुए और उन्होंने अपने समाज में सुधार करने का प्रयास किया।
सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण , स्वाधीनता आंदोलन ने साहित्य को जन चेतना की आधार भूमि प्रदान की। लगभग सभी भाषाओं के साहित्यकारों ने युग चेतना को गद्य और पद्य के माध्यम से आवाज दी। 1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात समाज में जो सन्नाटा व्याप्त हुआ, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए साहित्यकारों ने जन भावनाओं को माध्यम बनाया। प्रत्येक व्यक्ति को मुक्ति संघर्ष एवं अधिकार चेतना की दृष्टि से जागृत करने का कार्य साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से करने लगा। सामाजिक, राजनीतिक, जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक सभी प्रकार के पहलुओं को साहित्य द्वारा अभिव्यक्ति दी जाने लगी। सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण , स्वाधीनता संग्राम के प्रभाव में रचे गए साहित्य में उस समय की सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक दलों तथा विचारधाराओं का स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देता है।
सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति
1857 का भारतीय विद्रोह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ 1857-58 में भारत में एक बड़ा विद्रोह था, जो ब्रिटिश ताज की ओर से एक संप्रभु शक्ति के रूप में कार्य करता था। विद्रोह 10 मई 1857 को दिल्ली से 40 मील (64 किमी) उत्तर-पूर्व में मेरठ के गैरीसन शहर में कंपनी की सेना के सिपाहियों के विद्रोह के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद यह मुख्य रूप से ऊपरी गंगा के मैदान और मध्य भारत में अन्य विद्रोहों और नागरिक विद्रोहों में बदल गया, हालांकि विद्रोह की घटनाएं उत्तर और पूर्व में भी हुईं। विद्रोह ने उस क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता के लिए एक सैन्य खतरा पैदा कर दिया, और 20 जून 1858 को ग्वालियर में विद्रोहियों की हार के साथ ही इस पर काबू पाया जा सका। 1 नवंबर 1858 को, ब्रिटिशों ने हत्या में शामिल नहीं होने वाले सभी विद्रोहियों को माफी दे दी, हालांकि उन्होंने 8 जुलाई 1859 तक औपचारिक रूप से शत्रुता समाप्त होने की घोषणा नहीं की।
विद्रोह के कारण
• बड़ी संख्या में भारतीय शासकों और प्रमुखों को हटा दिया गया, जिससे अन्य सत्तारुढ़ परिवारों के मन में भय पैदा हो गया।
• रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को झाँसी के सिंहासन पर बैठने की अनुमति नहीं थी।
• डलहौज़ी ने अपने व्यपगत के सिद्धांत का पालन करते हुए सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी कई रियासतों को अपने अधिकार में ले लिया।
• भारत में तेज़ी से फैल रही पश्चिमी सभ्यता के कारण आबादी का एक बड़ा वर्ग चिंतित था।
• अंग्रेज़ों के रहन-सहन, अन्य व्यवहार एवं उद्योग-अविष्कार का असर भारतीयों की सामाजिक मान्यताओं पर पड़ता था।
• सती प्रथा तथा कन्या भ्रूण हत्या जैसी प्रथाओं को समाप्त करने और विधवा-पुनर्विवाह को वैध बनाने वाले कानून को स्थापित सामाजिक संरचना के लिये खतरा माना गया।
• शिक्षा ग्रहण करने के पश्चिमी तरीके हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमानों की रूढ़िवादिता को सीधे चुनौती दे रहे थे।
• ग्रामीण क्षेत्रों में किसान और ज़मींदार भूमि पर भारी-भरकम लगान और कर वसूली के सख्त तौर-तरीकों से परेशान थे।
• बड़ी संख्या में सिपाही खुद किसान वर्ग से थे और वे अपने परिवार, गाँव को छोड़कर आए थे, इसलिये किसानों का गुस्सा जल्द ही सिपाहियों में भी फैल गया।
• इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का प्रवेश भारत में हुआ जिसने विशेष रूप से भारत के कपड़ा उद्योग को बर्बाद कर दिया।
• एक भारतीय सिपाही को उसी रैंक के एक यूरोपीय सिपाही से कम वेतन का भुगतान किया जाता था।
• वर्ष 1856 में लॉर्ड कैनिंग ने एक नया कानून जारी किया जिसमें कहा गया कि कोई भी व्यक्ति जो कंपनी की सेना में नौकरी करेगा तो ज़रूरत पड़ने पर उसे समुद्र पार भी जाना पड़ सकता है।
तात्कालिक कारण
• 1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारण सैनिक थे।
• एक अफवाह यह फैल गई कि नई ‘एनफिल्ड’ राइफलों के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है।
• सिपाहियों को इन राइफलों को लोड करने से पहले कारतूस को मुँह से खोलना पड़ता था।
• हिंदू और मुस्लिम दोनों सिपाहियों ने उनका इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया।
• लॉर्ड कैनिंग ने इस गलती के लिये संशोधन करने का प्रयास किया और विवादित कारतूस वापस ले लिया गया लेकिन इसकी वजह से कई जगहों पर अशांति फैल चुकी थी।
• मार्च 1857 को नए राइफल के प्रयोग के विरुद्ध मंगल पांडे ने आवाज़ उठाई और अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर हमला कर दिया था।
• 8 अप्रैल, 1857 ई. को मंगल पांडे को फाँसी की सज़ा दे दी गई।
• 9 मई, 1857 को मेरठ में 85 भारतीय सैनिकों ने नए राइफल का प्रयोग करने से इनकार कर दिया तथा विरोध करने वाले सैनिकों को दस-दस वर्ष की सज़ा दी गई।
विद्रोह के केंद्र
• विद्रोह पटना से लेकर राजस्थान की सीमाओं तक फैला हुआ था। विद्रोह के मुख्य केंद्रों में कानपुर, लखनऊ, बरेली, झाँसी, ग्वालियर और बिहार के आरा ज़िले शामिल थे।
• लखनऊ: यह अवध की राजधानी थी। अवध के पूर्व राजा की बेगमों में से एक बेगम हज़रत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया।
• कानपुर: विद्रोह का नेतृत्व पेशवा बाजी राव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने किया था।
• झाँसी: 22 वर्षीय रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया। क्योंकि उनके पति की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने उनके दत्तक पुत्र को झाँसी के सिंहासन पर बैठाने से इनकार कर दिया।
• ग्वालियर: झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया और नाना साहेब के सेनापति तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने ग्वालियर तक मार्च किया और उस पर कब्ज़ा कर लिया।
दमन और विद्रोह
• 1857 का विद्रोह एक वर्ष से अधिक समय तक चला। इसे 1858 के मध्य तक दबा दिया गया था।
• मेरठ में विद्रोह भड़कने के 14 महीने बाद 8 जुलाई, 1858 को लॉर्ड कैनिंग द्वारा शांति की घोषणा की गई।
विद्रोह की असफलता के कारण
• सीमित प्रभाव: हालाँकि विद्रोह काफी व्यापक था, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा इससे अप्रभावित रहा।
• बड़ी रियासतें, हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर और कश्मीर तथा राजपूताना के लोग भी विद्रोह में शामिल नहीं हुए।
• दक्षिणी प्रांतों ने भी इसमें भाग नहीं लिया।
• प्रभावी नेतृत्व नहीं: विद्रोहियों में एक प्रभावी नेता का अभाव था। हालाँकि नाना साहेब, तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई आदि बहादुर नेता थे, लेकिन वे समग्र रूप से आंदोलन को प्रभावी नेतृत्व प्रदान नहीं कर सके।
• सीमित संसाधन: सत्ताधारी होने के कारण रेल, डाक, तार एवं परिवहन तथा संचार के अन्य सभी साधन अंग्रेज़ों के अधीन थे। इसलिये विद्रोहियों के पास हथियारों और धन की कमी थी।
• मध्य वर्ग की भागीदारी नहीं: अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त मध्यम वर्ग, बंगाल के अमीर व्यापारियों और ज़मींदारों ने विद्रोह को दबाने में अंग्रेज़ों की मदद की।
विद्रोह का परिणाम
• कंपनी शासन का अंत: 1857 का महान विद्रोह आधुनिक भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना था।
• यह विद्रोह भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अंत का कारण बना।
• ब्रिटिश राज का प्रत्यक्ष शासन: ब्रिटिश राज ने भारत के शासन की ज़िम्मेदारी सीधे अपने हाथों में ले ली।
• भारतीय प्रशासन को महारानी विक्टोरिया ने अपने अधिकार में ले लिया, जिसका प्रभाव ब्रिटिश संसद पर पड़ा।
• भारत का कार्यालय देश के शासन और प्रशासन को संभालने के लिये बनाया गया था।
• धार्मिक सहिष्णुता: अंग्रेज़ों ने यह वादा किया कि वे भारत के लोगों के धर्म एवं सामाजिक रीति-रिवाज़ों और परंपराओं का सम्मान करेंगे।
• प्रशासनिक परिवर्तन: भारत के गवर्नर जनरल के पद को वायसराय के पद से स्थानांतरित किया गया।
सन् 1857 क्रांति का हिंदी साहित्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। रामविलास शर्मा ने इसे हिंदी नवजागरण का प्रथम चरण घोषित किया। 1857 की क्रांति की तीव्र अभिव्यक्ति लोकगीतों एवं पत्र-पत्रिकाओं में हुई है। इसका तत्काल प्रतिफलन साहित्य के क्षेत्र में इस रूप में नहीं हुआ जी से रूप में होना चाहिए। किन्तु बाद के वर्षों में 1857 को केंद्र में रखकर ढेर सारा साहित्य लिखा गया।
पुनर्जागरण की समीक्षा
भारतीय पुनर्जागरण 18वीं और 19वीं शताब्दी में भारत में एक महत्वपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन था। इस आंदोलन ने भारतीय समाज में रूढ़िवादी प्रथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर सवाल खड़े किए और आधुनिक विचारों को अपनाया.
मुख्य विशेषताएं:
सामाजिक सुधार:
पुनर्जागरण आंदोलन ने सती प्रथा, बाल विवाह, जाति व्यवस्था जैसे सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया और सुधारों के लिए आवाज उठाई।
धार्मिक सुधार:
इस आंदोलन ने हिंदू धर्म के कुछ धार्मिक पहलुओं पर सवाल उठाए और तर्कसंगतता और एकेश्वरवाद पर जोर दिया।
शैक्षिक सुधार:
पुनर्जागरण ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा दिया और पश्चिमी ज्ञान को भारतीय शिक्षा में शामिल करने की वकालत की।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान:
आंदोलन ने भारतीय संस्कृति और इतिहास के प्रति गर्व की भावना को बढ़ावा दिया और प्राचीन भारतीय ज्ञान और दर्शन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।
राष्ट्रवाद की नींव:
भारतीय पुनर्जागरण ने भारत में राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रवाद की भावना को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख नेता:
राजा राममोहन राय:
उन्हें भारतीय पुनर्जागरण के जनक के रूप में माना जाता है। उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की और सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई।
दयानंद सरस्वती:
उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की और 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया।
स्वामी विवेकानंद:
उन्होंने रामकृष्ण मठ की स्थापना की और पश्चिमी देशों में भारतीय दर्शन का प्रचार किया।
राजा राम मोहन राय ने सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन के लिए एक नया आंदोलन शुरू किया। पश्चिमी दार्शनिकों के प्रभाव में अन्य बुद्धिजीवी भी इस आंदोलन में शामिल हो गए। अंग्रेजी साहित्य, विचारों और दर्शन का अध्ययन भारतीय पुनर्जागरण के दौरान उभरा। राजनीतिक आंदोलनों का इस पर एक निश्चित मात्रा में प्रभाव था।
भारतीय पुनर्जागरण से जीवन की गुणवत्ता बहुत प्रभावित हुई। इसी प्रकार, भारतीय पुनर्जागरण के दौरान प्रदर्शन कलाएँ नई ऊँचाइयों पर पहुँचीं। सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भी राष्ट्रवाद की भावना को प्रभावित किया। उन्होंने प्राचीन भारत के वैभव को पुनः स्थापित कर मातृभूमि के प्रति प्रेम का विचार फैलाया। उन्होंने अपने धर्म में विश्वास बढ़ाने और अपनी संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास किया। बंकिम चंद्र का "वंदे मातरम" राष्ट्रवादियों के लिए एक रैली बन गया।
गाने का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि अंग्रेजों को इसे गैरकानूनी घोषित करना पड़ा। इससे अंग्रेज भी भय से भर गये। लोगों की पीढ़ियाँ इसके द्वारा परम आत्म-बलिदान के लिए प्रेरित हुई हैं। स्वामी विवेकानन्द ने लोगों को सलाह दी कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।" यह भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में एक महत्वपूर्ण कारक था।
जिस प्रकार यूरोपीय नवजागरण इटली से होते हुए फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इंग्लैंड आदि देशों में फैला, ठीक उसी प्रकार भारतीय नवजागरण बंगाल से होते हुए महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिणी भारत तथा हिन्दी प्रदेश आदि क्षेत्रों में फैला । भारतीय विचारकों ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर आधुनिक काल तक के सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक सुधार कार्य को नवजागरण की संज्ञा दी । भारतीय नवजागरण का संबंध वस्तुतः अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज, राष्ट्र और स्वाधीनता आंदोलन के साथ जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय अस्मिता के सन्दर्भ में अगर यूरोप की तुलना भारत से की जाए तो हम देखेंगे उस समय यूरोपीय देश किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं था । जबकि भारत पर विदेशी शासकों का आधिपत्य था । भारतीय नवजागरण की कड़ी में राष्ट्रीयता और देशप्रेम एक प्रमुख प्रेरक तत्व के रूप में विद्यमान है। भारत में नवजागरण संबंधी चेतना ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने और समाज में फैल हुए अंधविश्वास एवं रुढ़िवाद के विरोध में शुरू हुआ ।
भारत में यह ऐसी चेतना पंद्रहवीं शताब्दी में भी देखी गई थी, जब इस्लाम के आगमन,और समाज में फैल हुए अंधविश्वास,रुढ़िवाद, शोषण तथा अत्याचार के विरोध में जनआंदोलन (भक्तिआंदोलन) की शुरूआत हुई। जिसके फलस्वरूप हमें कबीर, जायसी, तुलसी, सुरदास, गुरू नानक, चैतन्य महाप्रभु जैसे समाज सुधारक और कवि दिखते है। जिन्होनें सति प्रथा, कुरीति, पाखण्ड, आडम्बर, सामंती विचारों की जड़े हिला दी थी। इस चेतना के द्वारा केवल भक्त कवि ही नहीं ब्लकि ताज , मीरा जैसी भक्त कवयित्री भी दिखाई दी। जिन्होनें सामंती सोच और स्त्रियों पर लगे परम्परा के बन्धन को तोड़ने का प्रयास किया।
"राम स्वरूप चतुर्वेदी" मानते हैं कि पन्द्रहवीं शताब्दी की जागृति इस्लाम के आगमन और उसके सांस्कृतिक मेल जोल से उत्पन्न हुई और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान ब्रिटिश के आगमन और दो संस्कृति के मेल से एक रचनात्मक उर्जा जन्मी। आरम्भ में इस चेतना को समीक्षक नवोत्थान, प्रबोधन, रिनेसांस, पुनरूत्थान आदि कई नामों से पुकारते थे, किन्तु 1977 में रामविलास जी की पुस्तक "महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण" में तथ्यों एवं तर्को द्वारा इसे "नवजागरण" कहा और उसके बाद सभी ने उन्नीसवीं शताब्दी को नवजागरण और भक्तिकाल को लोकजागरण नाम से स्वीकार कर लिया।
19वीं शताब्दी के दौरान राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, देवेंद्रनाथ ठाकुर, केशवचंद्र सेन, महादेव गोविंद रानाडे, ज्योतिबा फुले, नारायण स्वामी, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, देवेंद्रनाथ टैगोर और रविंद्रनाथ टैगोर जैसे रचनाकारों तथा समाज सुधारकों ने अपनी रचनाओं तथा स्थापित स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा लोगों को जागृत किया और नवजागरण की चेतना को पूरे भारत में फैलाया।
निष्कर्ष
हिंदी भाषा ने स्वाधीनता संग्राम में और स्वाधीनता संग्राम ने हिंदी भाषा के विकास एवं संवर्धन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी भाषा ने ही देश को जोड़ने में अहम योगदान दिया। हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं उसे राजभाषा की मंजिल तक पहुंचाने में प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के योगदान का योगदान अत्यंत सराहनीय है। हिंदी भाषा और साहित्य में विदेशी शासन ब्रिटिश साम्राज्य को संप्रदायवाद धर्म वाद जातिवाद भड़काने का दोषी स्वीकार करते हुए साहित्य में उसकी नीतियों की भर्त्सना हुई। सामंत प्रायः अंग्रेजों के समर्थक थे, इसलिए उनके विरोध का स्वर आधुनिक भारतीय साहित्य विशेषकर हिंदी में सर्वत्र मिलता है। हिंदी भाषा तो क्रांतिकारियों एवं राष्ट्र भक्तों की हृदय उद्गार भाषा बन गई।
1857 की क्रांति और पुनर्जागरण दोनों ही भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण हैं। क्रांति ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक विद्रोह था, जबकि पुनर्जागरण भारतीय समाज और संस्कृति में एक नई जागृति थी। दोनों ही समय काल में महत्वपूर्ण बदलावों के प्रतीक हैं। क्रांति ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी, जबकि पुनर्जागरण ने भारतीय समाज को आधुनिक बनाने का प्रयास किया। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि क्रांति और पुनर्जागरण एक दूसरे से जुड़े हुए थे। क्रांति ने भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया, जबकि पुनर्जागरण ने भारतीय समाज को आधुनिक बनाने में मदद की और इन दोनों ही घटनाओं ने भारत के इतिहास को आकार दिया और आधुनिक भारत को जन्म दिया।
राष्ट्रप्रेम एवं समाज सुधार का भावपूर्ण चित्रण साहित्य का अहम हिस्सा रहा। स्वाधीनता संग्राम के बाद भारतीयों के लिए देश की परिकल्पना एक ऐसी चीज बन गई जिसमें क्षुद्रता के लिए कोई स्थान नहीं रहा। छोटे बड़े, ऊंच-नीच के सारे अंतर यहां तिरोहित हो गए और देश के लिए सभी एक मंच पर उतर आए। कवियों एवं साहित्य लेखको ने इस राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए इस भावना को स्वर्ण अक्षरों में अपने साहित्य में स्थान दिया।
धन्यवाद !
आपको हमारा ये लेख (आर्टिकल) “ सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण की समीक्षा ” कैसा लगा , अपनी राय लिखें और यदि आप चाहते हैं कि हम किसी अन्य विषय पर भी निबंध , कविता या लेख लिखे तो आप कमेंट के द्वारा हमें अपने सुझाव व विषय दे सकते हैं।
धन्यवाद ।

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