मार्क्स एक समाजवादी विचारक थे और यथार्थ पर आधारित समाजवादी विचारक के रूप में जाने जाते हैं। सामाजिक राजनीतिक दर्शन में मार्क्सवाद (Marxism) उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व द्वारा वर्गविहीन समाज की स्थापना के संकल्प की साम्यवादी विचारधारा है। मूलतः मार्क्सवाद उन राजनीतिक और आर्थिक सिद्धांतो का समुच्चय है जिन्हें उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में कार्ल मार्क्स, फ़्रेडरिक एंगेल्स और व्लादिमीर लेनिन तथा साथी विचारकों ने समाजवाद के वैज्ञानिक आधार की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया।
कार्ल मार्क्स का परिचय
कार्ल हेनरिख मार्क्स (जर्मन- Karl Heinrich Marx ; 5 मई 1818 - 14 मार्च 1883) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार, समाजशास्त्री, पत्रकार राजनीतिक अर्थव्यवस्था के आलोचक, समाजवादी क्रांतिकारी और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता थे।उनके सबसे प्रसिद्ध शीर्षक 1848 के पैम्फलेट "द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" और चार-खंड "दास कपिटल" (1867-1883) हैं। मार्क्स के राजनीतिक और दार्शनिक विचारों का बाद के बौद्धिक, आर्थिक और राजनीतिक इतिहास पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनका नाम एक विशेषण, एक संज्ञा और सामाजिक सिद्धांत के स्कूल के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
इनका जन्म 5 मई 1818 को जर्मनी के राइन प्रांत के ट्रियर नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था। 1824 में इनके परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। 17 वर्ष की अवस्था में मार्क्स ने कानून का अध्ययन करने के लिए बॉन विश्वविद्यालय जर्मनी में प्रवेश लिया। तत्पश्चात् उन्होंने बर्लिन और जेना विश्वविद्यालयों में साहित्य, इतिहास और दर्शन का अध्ययन किया। इसी काल में वह हीगेल के दर्शन से बहुत प्रभावित हुए। 1839-41 में उन्होंने दिमॉक्रितस और एपीक्यूरस के प्राकृतिक दर्शन पर शोध-प्रबंध लिखकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने 1843 में जर्मन थिएटर समीक्षक और राजनीतिक कार्यकर्ता जेनी वॉन वेस्टफेलन से शादी की । अपने राजनीतिक प्रकाशनों के कारण, मार्क्स राज्यविहीन हो गए और दशकों तक लंदन में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ निर्वासन में रहे, जहाँ उन्होंने जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर अपने विचार विकसित करना जारी रखा और ब्रिटिश म्यूजियम रीडिंग रूम में शोध करते हुए उनके लेखन को प्रकाशित करते रहे ।
शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् 1842 में मार्क्स उसी वर्ष कोलोन से प्रकाशित राइन समाचार पत्र में पहले लेखक और तत्पश्चात् संपादक के रूप में सम्मिलित हुए किंतु सर्वहारा क्रांति के विचारों के प्रतिपादन और प्रसार करने के कारण 15 महीने बाद ही 1843 में उस पत्र का प्रकाशन बंद करवा दिया गया। मार्क्स पेरिस चले गए, वहाँ उन्होंने 'द्यूस फ्रांजोसिश' जारबूशर पत्र में हीगेल के नैतिक दर्शन पर अनेक लेख लिखे। 1845 में वह फ्रांस से निष्कासित होकर ब्रूसेल्स चले गये और वहीं उन्होंने जर्मनी के मजदूर सगंठन और 'कम्युनिस्ट लीग' के निर्माण में सक्रिय योग दिया। 1847 में एजेंल्स के साथ 'अंतराष्ट्रीय समाजवाद' का प्रथम घोषणापत्र (कम्युनिस्ट मॉनिफेस्टो) प्रकाशित किया।
1848 में मार्क्स ने पुन: कोलोन में 'नेवे राइनिशे जीतुंग' का संपादन प्रारंभ किया और उसके माध्यम से जर्मनी को समाजवादी क्रांति का संदेश देना आरंभ किया। 1849 में इसी अपराघ में वह प्रशा से निष्कासित हुए। वह पेरिस होते हुए लंदन चले गए और जीवन पर्यंत वहीं रहे। लंदन में सबसे पहले उन्होंने 'कम्युनिस्ट लीग' की स्थापना का प्रयास किया, किंतु उसमें फूट पड़ गई। अंत में मार्क्स को उसे भंग कर देना पड़ा। उसका 'नेवे राइनिश जीतुंग' भी केवल छह अंको में निकल कर बंद हो गया।
1859 में मार्क्स ने अपने अर्थशास्त्रीय अध्ययन के निष्कर्ष 'जुर क्रिटिक दर पोलिटिशेन एकानामी' नामक पुस्तक में प्रकाशित किये। यह पुस्तक मार्क्स की उस बृहत्तर योजना का एक भाग थी, जो उन्होंने संपुर्ण राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखने के लिए बनाई थी। किंतु कुछ ही दिनो में उनको लगा कि उपलब्ध साम्रगी उसकी योजना में पूर्ण रूपेण सहायक नहीं हो सकती। अत: उन्होंने अपनी योजना में परिवर्तन करके नए सिरे से लिखना आंरभ किया और उसका प्रथम भाग 1867 में दास कैपिटल (द कैपिटल, हिंदी में पूंजी शीर्षक से प्रगति प्रकाशन मास्को से चार भागों में) के नाम से प्रकाशित किया। 'द कैपिटल' के शेष भाग मार्क्स की मृत्यु के बाद एंजेल्स ने संपादित करके प्रकाशित किए। 'वर्गसंघर्ष' का सिद्धांत मार्क्स के 'वैज्ञानिक समाजवाद' का मेरूदंड है। इसका विस्तार करते हुए उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या और बेशी मूल्य (सरप्लस वैल्यू) के सिद्धांत की स्थापनाएँ कीं। मार्क्स के सारे आर्थिक और राजनीतिक निष्कर्ष इन्हीं स्थापनाओं पर आधारित हैं।
1864 में लंदन में 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' की स्थापना में मार्क्स ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संघ की सभी घोषणाएँ, नीतिश् और कार्यक्रम मार्क्स द्वारा ही तैयार किये जाते थे। कोई एक वर्ष तक संघ का कार्य सुचारू रूप से चलता रहा, किंतु बाकुनिन के अराजकतावादी आंदोलन, फ्रांसीसी जर्मन युद्ध और पेरिस कम्यूनों के चलते 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' भंग हो गया। किंतु उनकी प्रवृति और चेतना अनेक देशों में समाजवादी और श्रमिक पार्टियों के अस्तित्व के कारण कायम रही।
'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' भंग हो जाने पर मार्क्स ने पुन: लेखनी उठाई। किंतु निरंतर अस्वस्थता के कारण उनके शोधकार्य में अनेक बाधाएँ आईं। मार्च 14, 1883 को मार्क्स के तूफानी जीवन की कहानी समाप्त हो गई। मार्क्स का प्राय: सारा जीवन भयानक आर्थिक संकटों के बीच व्यतीत हुआ। उनकी छह संतानो में तीन कन्याएँ ही जीवित रहीं।
मार्क्सवादी सिद्धांत
मार्क्सवाद को साहित्यिक रूप में प्रगतिवाद कहते हैं। प्रगतिवादी विचारधारा का मूलाधार साम्यवाद है। मार्क्सवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स जर्मन अर्थशास्त्री थे। कार्ल माक्र्स के सिद्धान्तों पर एंजिल्स का प्रभाव था।
मार्क्स की विचारधारा को तीन वर्गों में बाँटा गया है-
(1) द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद
(2) मूल्य वृद्धि का सिद्धान्त
(4) मानव सभ्यता के विकास का विवरण
मार्क्स का मानना है कि भौतिक विकास को परिचालित करने वाली प्रवृत्ति का नाम द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद है। इनका मानना है कि संघर्ष के बाद ही विकास होता है। दो वर्गों के संघर्ष से तीसरी शक्ति उत्पन्न होती है और इसी प्रक्रिया से नई-नई शक्तियों का विकास होता है। मार्क्सवाद किसी भी आलौकिक सत्ता जैसे- आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग नरक आदि के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है।
मूल्य वृद्धि का सिद्धान्त - इनके अनुसार वस्तु की उत्पत्ति में पाँच अंग सहायक होते हैं।
(1) मूल पदार्थ, (2) स्थूल साधन, (3) श्रमिक साधन, (4) श्रमिक का श्रम, (5) मूल्य वृद्धि।
यह ऐसा मानते हैं कि सारी सम्पत्ति पर पूँजीपतियों ने एकाधिकार कर लिया है। जिससे सारा लाभ पूँजीपति को होता है और मजदूर वर्ग का लगातार शोषण हो रहा है। मार्क्स ने वर्गों को दो भागों में बाँटा है-शोषण वर्ग व शोषित वर्ग। मार्क्स शोषण को समाप्त करके समाज में साम्यवादी व्यवस्था स्थापित करना चाहता है।
मानव सभ्यता के विकास की व्याख्या - वह मानव सभ्यता के इतिहास को दो वर्ग में बाँट देते हैं। शोषक और शोषित और इनके संघर्ष को वह फिर चार भागों में विभाजित करते हैं- (1) दास प्रथा, (2) सामन्ती प्रथा, (3) पूँजीवादी व्यवस्था, (4) साम्यवादी व्यवस्था।
इन सबके द्वारा मार्क्सवाद का लक्ष्य समाज में साम्यवादी व्यवस्था स्थापित करना है। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वह विद्रोह, हिंसा एवं क्रान्ति का समर्थन करता है। मार्क्सवाद वर्ग संघर्ष के लिए उत्तेजित करता है।
ऐतिहासिक भौतिकवाद
ऐतिहासिक भौतिकवाद मार्क्सवाद के बौद्धिक आधारों में से एक है।
इसके अनुसार उत्पादन के साधनों में तकनीकी प्रगति अनिवार्य रूप से उत्पादन के सामाजिक संबंधों में बदलाव लाती है। समाज का यह आर्थिक " आधार " वैचारिक "अधिरचना " द्वारा परिलक्षित होता है और उसे प्रभावित करता है, जिसमें संस्कृति, धर्म, राजनीति और मानवता की सामाजिक चेतना के अन्य सभी पहलू समाहित हैं। इस प्रकार यह आर्थिक, तकनीकी और मानव इतिहास के विकास और परिवर्तनों के कारणों, भौतिक कारकों, साथ ही जनजातियों, सामाजिक वर्गों और राष्ट्रों के बीच भौतिक हितों के टकराव के कारणों की तलाश करता है। कानून, राजनीति, कला, साहित्य, नैतिकता और धर्म को मार्क्स द्वारा समाज के आर्थिक आधार के प्रतिबिंब के रूप में अधिरचना बनाने के लिए समझा जाता है। कई आलोचकों ने तर्क दिया है कि यह समाज की प्रकृति का निरीक्षण है और दावा करते हैं कि जिसे मार्क्स ने सुपरस्ट्रक्चर कहा जाता है, उसका प्रभाव (यानी विचार, संस्कृति और अन्य पहलुओं का प्रभाव) उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि समाज की कार्यप्रणाली में आर्थिक आधार। । हालाँकि, मार्क्सवाद यह दावा नहीं करता है कि समाज का आर्थिक आधार समाज में एकमात्र निर्धारित तत्व है।
आलोचकों के अनुसार, यह मार्क्सवाद के लिए एक और समस्या खड़ी करता है। यदि अधिरचना भी आधार को प्रभावित करती है तो मार्क्स को निरंतर यह दावा करने की कोई आवश्यकता नहीं थी कि समाज का इतिहास आर्थिक वर्ग संघर्ष का इतिहास है। यह एक क्लासिक मुर्ग़ी-या-अंडा का तर्क बन जाता है कि आधार पहले आता है या अधिरचना। पीटर सिंगर का प्रस्ताव है कि इस समस्या को यह समझ कर हाल किया जा सकता है कि मार्क्स ने आर्थिक आधार को अंततः मानते थे। मार्क्स का मानना था कि मानवता को परिभाषित करने वाली विशेषता उसके उत्पादन के साधन हैं। अतः, मनुष्य को स्वयं को उत्पीड़न से मुक्त करने का एकमात्र तरीका उसके लिए उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखना था। मार्क्स के अनुसार, यही इतिहास का लक्ष्य है और अधिरचना के तत्व इतिहास के उपकरण के रूप में कार्य करते हैं।
मार्क्स ने कहा था कि भौतिक आधार और वैचारिक अधिरचना के बीच का संबंध एक निर्धारण सम्बन्ध (determination relation) था न कि एक कारण संबंध (causal relation)। हालांकि, मार्क्स के कुछ आलोचकों ने जोर देकर कहा है कि मार्क्स ने दावा किया कि सुपरस्ट्रक्चर आधार के कारण होने वाला एक प्रभाव था। उदाहरण के लिए, अराजक-पूंजीवादी मरी रॉथबार्ड ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि मार्क्स ने दावा किया कि समाज का "आधार" (इसके प्रौद्योगिकी और सामाजिक संबंध) अधिरचना (सुपरस्ट्रक्चर) में अपनी "चेतना" का निर्धारण करता है। लुडविग वॉन मीज़ेज़ के तर्कों पर आधारित, रॉथबार्ड मानते हैं कि यह मानवीय चेतना है जो प्रौद्योगिकी और सामाजिक संबंधों के विकास का कारण बनता है और उन्हें आगे बढ़ाता है। मार्क्स के इस ऐतिहासिक भौतिक शक्तियों के कारण आधार के निर्मित होने के दावे को दरकिनार करते हुए, रॉथबार्ड तर्क देते हैं कि मार्क्स इस बात की अनदेखी करते हैं कि आधार उत्पन्न कैसे होता है। इससे यह तथ्य छिप जाता है कि असली कारण पथ अधिरचना से आधार की ओर होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मनुष्य प्रौद्योगिकी और उन सामाजिक सम्बन्धों के विकास का निर्धारण करते हैं, जिन्हें वे आगे बढ़ाने की इच्छा रखते हैं। रॉथबार्ड ने वॉन मीज़ेज़ के हवाले से कहा, "हम मार्क्सवादी सिद्धांत को इस तरह संक्षेप में प्रस्तुत कर सकते हैं: शुरुआत में 'भौतिक उत्पादक बल' यानी मानव उत्पादक प्रयासों के तकनीकी उपकरण, औज़ार और मशीनें होती हैं। उनकी उत्पत्ति से संबंधित कोई भी सवाल पूछने की इजाज़त नहीं है; वे हैं, बस; हमें यह मानना है कि ये आसमान से गिरे हैं।"
ऐतिहासिक नियतत्ववाद
मार्क्स के इतिहास के सिद्धांत को ऐतिहासिक नियतत्ववाद (यह धारणा कि घटनाएँ पहले से निर्धारित हैं, या किन्हीं ताक़तों द्वारा जकड़ी हुई हैं, जिसके आधार पर कहा जाता है कि मनुष्य के कार्य स्वतंत्र नहीं होते) माना गया है। सामाजिक परिवर्तन के लिए एक अंतर्जात तंत्र के रूप में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर (उस सिद्धांत की) निर्भरता से जुड़ा हुआ है।
डायलेक्टिक (द्वंद्वात्मक तर्कपद्धति) की अवधारणा प्राचीन ग्रीक दार्शनिकों के संवादों से उभरती है। लेकिन इसे 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में हेगेल ने ऐतिहासिक विकासवाद की (अक्सर परस्पर रूप से विरोधी) ताकतों के लिए एक वैचारिक ढांचे के रूप में सामने लाया था। ऐतिहासिक निर्धारकवाद भी अर्नाल्ड ट्वानबी और ओसवाल्ड स्पेंगलर जैसे विद्वानों के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन वर्तमान में इस वैचारिक दृष्टिकोण का प्रयोग नहीं होता। इतिहास की ताकतों की समझ के लिए इस दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करने के प्रयास में, प्रभात रंजन सरकार ने ऐतिहासिक विकास पर मार्क्स के विचारों के संकीर्ण वैचारिक आधार की आलोचना की। 1978 की पुस्तक द डाउनफॉल ऑफ कैपिटलिज्म एंड कम्युनिज्म में, रवि बत्रा ने सरकार और मार्क्स के ऐतिहासिक निर्धारक दृष्टिकोणों में महत्वपूर्ण अंतर बताया।
व्यक्तिगत अधिकारों का दमन
विभिन्न विचारकों ने तर्क दिया है कि एक कम्युनिस्ट राज्य अपने स्वभाव से ही अपने नागरिकों के अधिकारों का हनन करेगा, जो कि सर्वहारा वर्ग की हिंसक क्रांति और तानाशाही, उसके समूहवादी (न कि व्यक्तिवादी) स्वभाव, लोगों के बजाय "जनसाधारण" पर निर्भरता, ऐतिहासिक नियतत्ववाद और केन्द्रिय नियोजित अर्थव्यवस्था के कारण है।
अमेरिकी नवशास्त्रीय अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने तर्क दिया कि समाजवाद के तहत एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की अनुपस्थिति अनिवार्य रूप से एक सत्तावादी राजनीतिक शासन (तानाशाही) को जन्म देगी। फ्रीडमैन के दृष्टिकोण से फ़्रीड्रिक हायक भी सहमत थे। वे मानते थे कि किसी देश में स्वतंत्रता पनपने के लिए पूंजीवाद का पहले से होना ज़रूरी है। कुछ उदारवादी सिद्धांतकारों का तर्क है कि संपत्ति का किसी भी प्रकार से किया जाने वाला पुनर्वितरण एक तरह का ज़ुल्म है।
आर्थिक
कई कारणों से मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की आलोचना की गई है। कुछ आलोचक पूँजीवाद के मार्क्सवादी विश्लेषण की ओर इशारा करते हैं जबकि अन्य लोग तर्क देते हैं कि मार्क्सवाद द्वारा प्रस्तावित आर्थिक प्रणाली असाध्य है।
यह भी संदेह है कि पूंजीवाद में लाभ की दर मार्क्स की भविष्यवाणी के अनुसार गिर जाएगी। 1961 में, मार्क्सवादी अर्थशास्त्री नोबुओ ओकिशियो ने यह दिखाते हुए एक प्रमेय ( ओकिशियो का प्रमेय ) दिया कि यदि पूंजीपति लागत में कटौती की तकनीक का अनुसरण करते हैं और यदि वास्तविक मजदूरी वेतन नहीं बढ़ता है, तो लाभ की दर में वृद्धि होनी चाहिए।
सामाजिक
सामाजिक आलोचना इस दावे पर आधारित है कि समाज की मार्क्सवादी अवधारणा मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।
इतिहास के मार्क्सवादी चरणों, वर्ग विश्लेषण और सामाजिक विकास के सिद्धांत की आलोचना की गई है। ज्यां-पाल सार्त्र ने निष्कर्ष निकाला कि "वर्ग" एक समरूप इकाई नहीं थी और वह कभी भी क्रांति नहीं ला सकती थी, लेकिन फिर भी वे मार्क्सवादी मान्यताओं की वकालत करते रहे।मार्क्स ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनका सिद्धांत एशियाई सामाजिक प्रणाली (जो उन्होंने मुख्यतः भारत को साक्ष्य में रखकर समझी थी) के आंतरिक विकास की व्याख्या नहीं कर सकता है, जहां दुनिया की ज़्यादातर आबादी हजारों वर्षों से रहती आई थी।
मार्क्सवाद की विशेषताएँ
(1) पूँजीवाद व विरोध,
(2) धर्म, ईश्वर एवं परलोक का विरोध,
(3) शोषित वर्ग की दीनता एवं निर्धनता का चित्रण करते हुए उनके प्रति सहानुभूति,
(4) नारी का यथार्थ चित्रण,
(5) यह साहित्य को वर्ग सिद्धान्त के प्रचार का साधन मानते थे।
(6) ये उन विचारों का विरोध करते थे जो सर्वहारा वर्ग के हितों की रक्षा नहीं करते हैं।
(7) मार्क्सवाद, आदर्शवाद सौन्दर्यवाद का विरोध करता है। सौन्यवाद में भौतिक आवश्यकताओं को महत्व प्रदान नहीं करता है।
मार्क्सवाद की भाँति ही प्रगतिवादी साहित्य ने शोषण का विरोध और किसानों, मजदूरों के संघर्ष पर बल दिया। प्रगतिवादी कवियों में नार्गाजुन, त्रिलोचन, दिनकर आदि के नाम लिये जा सकते है। इनकी रचनाओं में प्रगतिवादी विचारधारा के दर्शन होते हैं। यह सभी मार्क्सवाद से प्रभावित हैं।
मार्क्सवाद का हिन्दी साहित्य पर प्रभाव
मार्क्सवाद का हिन्दी साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। मुंशी प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन 1936 ई. की अध्यक्षता करते हुए लखनऊ में कहा था कि "अब सौन्दर्य केवल सुन्दर गोरी स्त्री के लिपिस्टिक लगे होठों में ही नहीं देखना होगा बल्कि अपने बच्चे को खेत के मेड़ पर सुलाकर काम करने वाली युवती के पपड़ी पड़े होठों में भी देखना होगा।"
हिन्दी-आलोचना ने मार्क्सवादी मान्यताओं का आत्मसात कर हिन्दी आलोचना के मार्ग को प्रशस्त किया। आलोचना के क्षेत्र में मार्क्सवादी आलोचना-पद्धति विकसित हुई। डॉ. रामविलास शर्मा (प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ, प्रगति और परम्परा) डॉ. शिवदान सिंह चौहान (प्रगतिवाद, आलोचना के मान), रांगेय राघव ( प्रगतिशील साहित्य के मानदंड), चंद्रबली पाण्डेय, अमृतराय ( नयी समीक्षा), नामवर सिंह (कविता के नये प्रतिमान), मुक्तिबोध (नये साहित्य का सौन्दर्य-शास्त्र) इत्यिादि ने मार्क्सवाद आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
मार्क्सवाद ने साहित्य की भाषा-शैली को भी प्रभवित किया। मार्क्सवाद के फलस्वरूप हिन्दी साहित्य में ओज-प्रभाव से युक्त आह्वानात्मक भाषा-शैली, खंडन-मंडनात्मक भाषा-शैली, घात-प्रतिघातात्मक भाषा-शैली, प्रश्नोत्तरात्मक भाषा-शैली एवं व्यंगयात्मक भाषा-शैली का प्रचलन हुआ।
मार्क्सवादी सिद्धांत की समीक्षा।
मार्क्सवाद विभिन्न समीक्षा व आलोचना का विषय रहा है। इसने समाज को दो वर्गों, जिनके पास कुछ (the haves) और जिनके पास कुछ नहीं है (the have-nots) में विभाजित किया है। यह वास्तविकता से दूर है। समाज बहुत जटिल होता है और कुई समूहों में बंटा होता है। जैसे कि मार्क्सवाद की परिकल्पना है, वैसा कोई स्पष्ट वर्गों का विभाजन नहीं होता है। ज्यादातर, इसमें विषाल मध्य वर्ग होता है। मार्क्सवादी विचारकों ने भविष्यवाणी की थी कि पूँजीवाद के विकास के साथ, मध्य वर्ग विलीन हो जाएगा और सर्वहारा वर्ग के साथ मिल जाएगा लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है और ऐसा होने की कोई संभावना नहीं है। वास्तव में इसके विपरीत हुआ है; मध्य वर्ग ने अपनी स्थिति को मजबूत किया है और अपने आकार को बढ़ाया है। मार्क्सवादियों ने पूँजीपति वर्ग के सिमटने की बातें की थीं। यहाँ पुनः ठीक इसके विपरीत हुआ है। सिमटने के बदले पूँजीपति वर्ग का आधार विस्तृत हुआ है। मार्क्स ने पूँजी संग्रह की बात की थी, लेकिन पूँजी का बिखराव हो गया है। सर्वहारा वर्ग की स्थिति वैसी नहीं बिगड़ी है, जैसे कि मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी। इस प्रकार, पूँजीवाद की वास्तविक कार्यकारी प्रणाली ने वर्गों के मार्क्सवादी सिद्धांत को गलत साबित किया है।
मार्क्सवादियों ने भविष्यवाणी की थी कि पूँजीवाद अन्तर्विरोध के कारण बिखर जाएगा। लेकिन, अभी तक ऐसा घटित नहीं हुआ है। कोई विकसित पूँजीवादी व्यवस्था ध्वस्त नहीं हुई है। पूँजीवाद ने अपने लचीलेपन को साबित किया है। दूसरी ओर, समाजवादी व्यवस्था, दुनिया के विभिन्न भागों में ध्वस्त हो गयी है। पूँजीवाद के पास सामंजस्य बिठाने की अपार शक्ति है। यही इसके जीवंत होने का मुख्य कारण है। मार्क्स पूँजीवाद का सही आंकलन करने में असफल रहे हैं।
मार्क्स के अनुसार, सर्वहारा क्रांति तभी होगी, जब पूँजीवाद परिपक्व हो जायेगा। पिछड़े सामंतवादी समाज में सर्वहारा क्रांति के घटित और सफल होने का अवसर नहीं होता है। लेकिन वास्तव में यही घटित हुआ है। क्रांति सिर्फ सामंतवादी समाजों जैसे रूस, चीन, वियतनाम, क्यूबा इत्यादि देषों में हुई हैं। यह रूसी मार्क्सवादियों के दो गुटों, प्लैखनॉव (Plekhnov) के नेतृत्व में मैंषेविक्स (Mensheviks) और लेनिन के नेतृत्व में बॉलषेविक्स (Bolsheviks) के बीच विवाद का मुख्य मुद्दा था। अंततः बॉलषेविक्स का मैनषेविक्स के ऊपर वर्चस्व रहा, लेकिन वे मार्क्स के विचारों के अधिक नज़दीक थे। मार्क्स के अनुसार, उनके विचार सामाजिक विकास के जन्म की वेदना को कम कर सकते हैं, लेकिन किसी भी अवस्था को नज़रअंदाज नहीं कर सकते। फिर भी लेनिन और ट्रॉटस्की ने रूस में और माओ ने चीन में पूँजीवाद की स्थापना की प्रक्रिया से गुज़रे बिना सामंतवादी समाज में साम्यवाद की स्थापना की। इस प्रत्यक्ष विरोधाभास के समाधान के लिए टॉटस्की ने थ्योरी ऑफ परमानेंट रिवॉल्युषन, को विकसित किया। उन्होंने अपने सिद्धांत में मध्यवर्ग की क्रांति को सर्वहारा की क्रांति के साथ मिला दिया। ये दोनों क्रांतियां ट्रॉटस्की की दृष्टि में साथ-साथ घट सकती हैं। यद्यपि यह अधिक व्यवहारिक विचार प्रतीत होता है, यह मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों को नहीं स्वीकार करता है।
आर्थिक निर्धारकवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत की कठोर आलोचना की गयी है। यह सिर्फ आर्थिक कारक ही नहीं होता है, बल्कि दूसरे कारक भी सामाजिक परिवर्तन लाने में समान रूप से महत्त्वपूर्ण होते हैं। यदि अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज, नैतिकता, मूल्य प्रणाली इत्यादि को निर्धारित करती है, तब अर्थव्यवस्था भी अपने आप इनके द्वारा निर्धारित होती है। यह दो तरफा प्रक्रिया है। आर्थिक शक्तियाँ राजनीति, समाज, संस्कृति, धर्म, मूल्यों, आदर्षों इत्यादि के प्रभावों से अछूती नहीं है। यदि आधार या नींव अधिरचना को आकार देते हैं, तो अधिरचना भी नींव को आकार देती है। इस प्रकार आर्थिक निर्धारकवाद के सिद्धांत को स्वीकारा नहीं जा सकता है। बाद के मार्क्सवादी विचारकों, जैसे कि ग्रामसी ने अधिरचना की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया।
सर्वहारा का अधिनायकत्व और साम्यवाद की मार्क्सवादी अवधारणाओं, में कई कमियाँ हैं। सर्वहारा क्रांति के बाद सर्वहारा मध्य वर्ग से राज्य की मषीनरी को छीन लेगा। साम्यवाद की स्थापना के बाद राज्य फालतू हो जाएगा और धीरे-धीरे विलीन हो जाएगा। यह घटित नहीं हुआ है। समाजवादी समाज में राज्य वास्तव में सर्व-षवित्तमान बन गया। कमज़ोर होने के बदले राज्य ने अपनी स्थिति दृढ़ बना ली है और इसके मुरझाने की कोई संभावना नहीं है। राज्य समाजवादी और मार्क्सवादी समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा और इसे संग्रहालय को कभी भी सौंपे जाने की कोई संभावना नहीं है।
समाजवादी समाज की जहाँ कहीं भी स्थापना की गयीं है, या तो उसे उतार फेंका गया या नज़रअंदाज किया गया है। जहाँ कहीं भी यह अभी भी जीवित है, इसे बहुत सारे परिवर्तन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जो वर्गीय मार्क्सवाद की विचारधारा से मेल नहीं खाता है। पूर्वी यूरोप में सामयवाद की असफलता, रूस में बिखराव और चीन में आर्थिक सुधारों ने फ्रांसिस फुकुयामा सरीखे विचारकों को मार्क्सवाद की ऑबिटयुरी (obituary) लिखने को बाध्य किया है। फुकुयामा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक एण्ड ऑफ हिस्ट्री में शीतमुद्रा कालीन संसार (post-coldwar) में साम्यवाद के ऊपर पूँजीवाद की विजय का दावा किया है। उनके अनुसार पूँजीवाद की साम्यवाद पर विजय, इतिहास के अंत को दर्षाता है। यहाँ फुकुयामा हेगेल के अर्थ में इतिहास की बात करते हैं। पूँजीवाद के बाद आगे कोई आर्थिक और राजनीतिक विकास नहीं होगा। पूँजीवाद सबसे विवेकषील और पूर्ण प्रणाली है। यह सबसे पूर्ण विचारधारा और दर्षन है। इसलिए, वैचारिक और दार्षनिक विकास का अंत पूँजीवाद के उद्भव के साथ ही हो जाता है। इसका मुख्य चुनौतीकर्ता साम्यवाद पराजित हो गया है और यह आगे अपने दावों को साबित करता है कि यह मानवता द्वारा कभी भी विकसित प्रणालियों में से सबसे उत्तम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रणाली है।
फुकुयामा के द्वारा दिए गए सिद्धांत को स्वीकार करना बहुत ही कठिन है। मार्क्सवाद की प्रमुखता दो क्षेत्रों में निहित है। सर्वप्रथम, इसे सामाजिक विष्लेषण का एक कारक बनाया गया है। द्वितीय, यह आवाजविहीन को आवाज़ देता है। यह गरीबों, उत्पीड़ित और दमित लोगों का दर्षन हैं। यदि मार्क्सवाद की देन का विष्लेषण इन दोनों क्षेत्रों के संदर्भ में किया जाये तो, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि यह अभी भी प्रासंगिक है और फिजूल नहीं है, जैसा कि उदारवादी आलोचकों द्वारा दावा किया जाता है। सामाजिक विष्लेषण के एक आयाम के रूप में मार्क्सवाद आज भी प्रासंगिक है, जैसा कि यह पहले था। सामाजिक विष्लेषण की एक विधि के रूप में इसका महत्त्व कभी भी समाप्त नहीं होगा, चाहे सामाजवादी राज्य जीवित रहता है या समाप्त हो जाता है।
मार्क्सवाद एक विचारधारा के रूप में अपनी श्रेष्ठता निष्चियतया खो चुका है, लेकिन यह पूरी तरह से फालतू नहीं है। जब तक शोषण रहेगा, लोगों का दमन और उत्पीड़न होता रहेगा, मार्क्सवाद प्रासंगिक बना रहेगा। मार्क्सवाद, शोषित और उत्पीड़ित के दर्षन के रूप में उनकी मुक्ति के लिए जनता को प्रेरित करता रहेगा। इसलिए, इसकी पराजय और अप्रासंगिकता का प्रष्न नहीं है। वास्तव में, प्रणालियाँ जो बिखर चुकी हैं, वे वर्गीय मार्क्सवादी सिद्धांतों पर संगठित नहीं थी। वे मार्क्सवादी-लेनिनवाद और स्टालिनवाद से अलग थीं। इसलिए यह लेनिनवादी-स्टालिनवादी प्रणालियाँ है, जो यूरोप और जहाँ कहीं भी वे हैं, बिखर चुकी हैं और जो वर्गीय मार्क्सवाद नहीं है।
मार्क्सवाद एक आयाम के रूप में सामाजिक विष्लेषण के लिए विद्वानों के द्वारा उपयोग किया जाता रहेगा और शोषित-दमित लोग अपनी मुक्ति के लिए मार्क्सवादी दर्षन का समर्थन करते रहेंगें। यहाँ मार्क्सवाद कभी भी अप्रासंगिक नहीं बनेगा। यह सदैव उदारवाद का वैकल्पिक दर्षन बना रहेगा। मार्क्सवाद उदारवाद के अत्याचारों पर प्रभावकारी रोक के रूप में भी कार्य करेगा। यह पूँजीवादी प्रणाली की कठोरता को कम करेगा।
मार्क्सवाद एक जीवंत दर्शन है। मार्क्स के बाद इसे लेनिन, टॉटस्की, स्टैलिन, रोजा लग्जमबर्ग, ग्राम्सी, लुकास, ऐलथूज़ैर, माओ आदि विचारकों ने समृद्ध किया है। विचारधारा और इतिहास के अंत के प्रतिपादकों ने मार्क्सवाद के उल्लेख खत्म होने का किया है। लेकिन मार्क्सवाद सामाजिक विश्लेषण के एक आयाम और उत्पीड़ित वर्ग के दर्शन के रूप में प्रासंगिक रहेगा। यह जनमानस को उनकी मुक्ति के लिए संघर्ष हेतु प्रेरित करेगा। मार्क्सवाद एक क्रांतिकारी दर्शन है। यह एक सामाजिक परिवर्तन का दर्शन है। मार्क्स के शब्दों में, दार्शनिकों ने विश्व की व्याख्या का प्रयास किया है, पर सवाल है इसे बदलने का इसका उद्देश्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण से मुक्त समतावादी समाज की स्थापना करना है। सिर्फ मार्क्सवाद के माध्यम से शायद मानवता आवश्यकता के क्षेत्र से स्वतन्त्रता के क्षेत्र तक बढेगी।
निष्कर्ष
कुछ लोकतांत्रिक समाजवादी और सामाजिक लोकतंत्र इस विचार को खारिज करते हैं कि समाज केवल वर्ग संघर्ष और सर्वहारा क्रांति के माध्यम से समाजवाद प्राप्त कर सकते हैं। कई अराजकतावादी एक क्षणिक राज्य चरण (सर्वहारा की तानाशाही) की आवश्यकता को अस्वीकार करते हैं। कुछ विचारकों ने मार्क्सवाद के मूल सिद्धांतों जैसे ऐतिहासिक भौतिकवाद और मूल्य के श्रम सिद्धांत को खारिज कर दिया है और पूंजीवाद की आलोचना और अन्य तर्कों का उपयोग करते हुए समाजवाद की वकालत की है।
मार्क्सवाद के कुछ समकालीन समर्थक मार्क्सवादी विचारधारा के कई पहलुओं को व्यवहार्य मानते हैं, लेकिन उनका तर्क है कि आर्थिक, राजनीतिक या सामाजिक सिद्धांत के कुछ पहलुओं के संबंध में यह अधूरा है या पुराना हो चुका है। इसलिए वे अन्य मार्क्सवादियों के विचारों के साथ कुछ मार्क्सवादी अवधारणाओं को जोड़ सकते हैं (जैसे कि मैक्स वेबर)- फ्रैंकफर्ट स्कूल इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण प्रदान करता है।
इतिहासकार पॉल जॉनसन ने लिखा है: "सच्चाई यह है, कि मार्क्स द्वारा किए गए सबूतों के प्रयोग की सबसे सतही स्तर की जांच भी व्यक्ति को उनके द्वारा लिखी गई हर उस चीज़ को शक़ की नज़र से देखने के लिए मजबूर करती है, जिसके लिए उन्होंने तथ्यात्मक डेटा का सहारा लिया था"। उदाहरण के लिए, जॉनसन ने कहा: "दास कैपिटल का मुख्य अध्याय आठ पूरा का पूरा जानबूझकर और व्यवस्थित ढंग से किया गया मिथ्याकरण है, जिसका प्रयोग एक ऐसी थीसिस को साबित करने के लिए किया गया है, जिसे तथ्यों की वस्तुनिष्ठ परीक्षा करने पर अप्राप्य पाया गया"।
मार्क्सवाद एक जीवंत दर्शन। मार्क्स के बाद इसे लेनिन, टॉटस्की, स्टैलिन, रोजा लग्जमबर्ग, ग्राम्सी, लुकास, ऐलथूजैर, माओ आदि विचारकों ने समृद्ध किया है। विचारधारा और इतिहास के अंत के प्रतिपादकों ने मार्क्सवाद के, उल्लेख खत्म होने का किया है। लेकिन मार्क्सवाद सामाजिक विष्लेषण के एक आयाम और उत्पीडित वर्ग के दर्शन रूप में प्रासंगिक रहेगा। यह जनमानस को उनकी मुक्ति के लिए संघर्ष हेतु प्रेरित करेगा। मार्क्सवाद एक क्रांतिकारी दर्शन । यह एक सामाजिक परिवर्तन का दर्शन । मार्क्स के शब्दों में, दार्शनिकों ने विष्व की व्याख्या का प्रयास किया है, पर सवाल है इसे बदलने का इसका उद्देश्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण से मुक्त समतावादी समाज की स्थापना करना है।
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