नागार्जुन के व्यक्तित्व व कृतित्व का आलोचनात्मक अध्ययन
नागार्जुन ( 30 जून 1911 - 5 नवम्बर 1998 ) हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। अनेक भाषाओं के ज्ञाता तथा प्रगतिशील विचारधारा के साहित्यकार नागार्जुन ने हिन्दी के अतिरिक्त मैथिली संस्कृत एवं बाङ्ला में मौलिक रचनाएँ भी कीं तथा संस्कृत, मैथिली एवं बाङ्ला से अनुवाद कार्य भी किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नागार्जुन ने मैथिली में यात्री उपनाम से लिखा तथा यह उपनाम उनके मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र के साथ मिलकर एकमेक हो गया।
जीवन परिचय
जन्म: 30 जून 1911, सतलखा गाँव, मधुबनी, बिहार.
मूल नाम: वैद्यनाथ मिश्र.
उपनाम: यात्री.
मृत्यु: 5 नवंबर 1998.
शिक्षा: उन्होंने संस्कृत, मैथिली और हिंदी में शिक्षा प्राप्त की.
साहित्यिक योगदान: उन्होंने हिंदी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में कविताएँ, उपन्यास, कहानी, निबंध, जीवनी, अनुवाद आदि लिखा.
प्रमुख रचनाएँ: "भस्मांकुर", "पत्रहीन नग्न गाछ", "रतिनाथ की चाची", "बलचनमा", "वरुण के बेटे".
राजनीतिक संबद्धता: वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे और समाज के निचले वर्ग के हितों का समर्थन किया.
जन्म :-
नागार्जुन के जन्मतिथि के बारे में विद्वानों में मतभिन्नता है। "हिन्दी साहित्य कोश में उनका जन्म सन 1910 दिया गया है।" डॉ. प्रकाशचंद्र भट्ट ने "उनका जन्म 1911, 30 जून मास की किसी तिथि (जेष्ठ मास की पूर्णिमा) को माना है।"" डॉ. ज्ञानेशदत्त हरित ने भी अपने प्रकाशित शोध-प्रबंध 'नागार्जुन व्यक्तित्व और कृतित्व' में सन 1911 को ही जन्म माना है। प्रा. अर्जुन जानू घरात ने नागार्जुन का जन्म 1911 में जेष्ठ मास की पूर्णिमा को ही माना है। इसी तरह नागार्जुन की जन्मतिथी का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। नागार्जुन ने स्वयं भी सन 1911 में ही अपना जन्म ननिहाल के ग्राम सतलखा, पोस्ट मधुबनी, दरभंगा शहर से दस-पंद्रह मील पूरब में तरौनी है वहाँ एक संस्कृत पंडित घराने में हुआ था।
बचपन :-
नागार्जुन के बचपन में ही माँ का देहावसान हो गया था। अपने नाना के यहाँ से महिषी ग्राम में मिली भू-सम्पत्ति की देखभाल के लिए वहाँ जाकर बसने के साथ पिता श्री गोकुल मिश्र के साथ बालक वैद्यनाथ मिश्र का बचपन बीता। बचपन में उन्हें 'ढक्कन' कहकर पुकारते थे। कोसी नदी की छोटी सी शाखा घेमुड़ा नदी के किनारे बसा हुआ यह गाँव कवि, कथाकार नागार्जुन की बचपन की स्मृतियों का केन्द्र रहा है।
परिवार :-
नागार्जुन के पिता का नाम गोकुल मिश्र था तथा माता का नाम उमादेवी था। उमादेवी सरल प्रकृति की ग्रामीण महिला थी। नागार्जुन के जन्म के पूर्व चार भाई-बहनों का शैशवकाल में ही देहांत हो चुका था। नागार्जुन की चार वर्ष की अवस्था में ही माँ चल बसी। इस प्रकार मातृहीन बालक पर अपने घुमक्कड पिता का प्रभाव पडा, जिससे इन्होंने भी आगे चलकर यायावरी जीवन ही अपनाया। तेरह वर्ष की आयु के बाद नागार्जुन घर के प्रति बिलकुल उदास हो गये वे, विद्रोही प्रवृत्ति के बने।
शिक्षा :-
नागार्जुन की आरम्भिक शिक्षा गाँव की संस्कृत पाठशाला में हुई। उनका बचपन निम्न वर्ग के लोगों के साथ बिता है। बालक नागार्जुन के हृदय में इसी कारण गरीबों के प्रति करूणा उत्पन्न हो गई। इसके फलस्वरूप उनके उपन्यासों में निम्नवर्ग और गरीब जनता का चित्रण मिलता है। वे निम्न जाति के हम उम्र ब्राह्मण के साथ खेला करते थे, और उच-नीच तथा बाह्य आडम्बरों आदि का उन्होंने सदैव विरोध किया है।
नागार्जुन ने संस्कृत का गहन अध्ययन किया। साहित्यशास्त्र में आचार्य तक पढ़े। व्याकरण का अध्ययन उन्होंने काशी संस्कृत विद्यालय से चार साल पढ़कर किया। फिर एक साल पचगछिमार (जिला सहरसा) और एक साल कलकत्ता रहे। संस्कृत भाषा में अनुष्वसन्ततलिका, पृथ्वी, शिखरिणी आदि छंदों का अध्ययन किया। इस सिलसिले में उनके गुरू री अनिनरूद्ध मिश्र ने बहुत बडी मदत की। नागार्जुन पाली भाषा तथा बौद्ध-दर्शन के अध्ययन के लिए केलानिया (श्रीलंका) में ही रहे। उन्होंने कलकत्ता में संस्कृत महाविद्यालय में पंद्रह रूपये की छात्रवृत्ति पाई, छात्रावास में मुक्त आवास में अध्ययन भी किया था। नागार्जुन लगभग दो वर्षों तक लंका में रहे। यहाँ का सारा समय अध्ययन एवं अध्यापन में बिताया।
नौकरी :-
नागार्जुन की नौकरी के संदर्भ में उनके पिता का कथन है, "यह काम तो मैं भी कर सकता हूँ, हाट बजार में जाकर दस-बीस किताबियाँ जरूर बेच आऊँगा। अपना तम्बाकू और घी सब्जी का खर्च चलेगा। बहू यही करेगी। तुम बाहर चले जाओ, अच्छी भली नौकरी ढूँढ लो।" इसी प्रकार नागार्जुन ने काव्य तीर्थ की उपाधि का अध्ययन पूरा किये बिना ही सन 1934 में सहारनपुर में सौ रूपये मासिक वेतनपर प्राकृत से हिन्दी में अनुवाद किया करते थे। परंतु एक वर्ष काम करने के बाद यह पद उन्होंने छोड दिया। जीविका चलाने के लिए वे पंजाब में एक पत्रिका 'दिपक' का संपादन करने लगे। श्रीलंका में अध्यापन का काम भी किया है।
विवाह :-
नागार्जुन का विवाह उन्नीस वर्ष की आयु में अपराजिता देवी से हुआ। उनके हृदय में पत्नी के प्रति सदैव सहानुभूति के भाव रहे, वे अपनी पत्नी को प्यार से 'अपू' कहकर संबोधित करते थे, फिर भी अपनी यायावरी वृत्ति के कारण यथोचित स्नेह, प्यार अपनी पत्नी को न दे सके।
संतान :-
नागार्जुन को चार पुत्र और दो पुत्रियाँ है। पुत्र शोभाकांत, सुकांत, श्रीकांत और श्यामाकांत और पुत्रियाँ उर्मिला और मंजू है। आर्थिक परिस्थिति के कारण उनकी संतानें उच्चशिक्षा से वंचित रह गयी है।
मृत्यु :-
साहित्य की यात्रा करते-करते, पारिवारिक आपदा सहते हुए बीमारी के कारण नागार्जुन कमजोर बने। अतः उनकी जीवन यात्रा 5 नवंबर 1998 में समाप्त हो गयी। भौतिक संसार से नागार्जुन चल बसे, परंतु साहित्य जगत में अपनी अनमोल रचना के कारण सदा याद रहेंगे। सामान्य जनों का साहित्यकार आम आदमी के दिल पर राज करता रहेगा, ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा।
रचनाएं
उनके साधारण एवं सरल व्यक्तित्व की छाप उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखने मिलती है। उनकी रचनाओं में किसी भी प्रकार का दिखावा या बनावटीपन नहीं है। वह सहज एवं स्वाभाविक है। किसी हरफनमौला शख्सियत की तरह उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं पर लेखन किया है जैसे उपन्यास, कहानी, काव्य, निबंध, जीवनी, अनुवाद इत्यादि। इसके अतिरिक्य संस्कृत, मैथिली, बंगला में भी साहित्य सृजन किया है।
नागार्जुन के उपन्यासः
• रतिनाथ की चाची • बलचनमा • नई पौध • बाबा बटेरसनाथ • दुखमोचन • वरूण के बेटे • कुम्भीपाक • हीरक जयंती • उग्रतारा • इमरतिया • पारो • गरीबदास ।
नागार्जुन की कहानियाँ:
असमर्थदाता, ताप-हारिणी, जेठा, कायापलट, विशाखा मृगारमाता, ममता, विषमज्वर, हीरक जयंती, हर्ष चरित की पॉकिट, एडीशन, मनोरंजन टैक्स, आसमान में चन्दा तैरे, भूख मर गई थी, सूखे बादलों की परछाईयाँ ।
नागार्जुन विरचित कविता संकलन :
• हजार-हजार बाहों वाली • सतरंगे पंखोवाली • खिचड़ी विप्लव देखा हमने • युगधारा • इस गुब्बारे की छाया में • मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा • अपने खेत में • भूल जाओ पुराने सपने • रत्नगर्भ • पुरानी जूतियों का कोरस • भूमिजा ।
संस्कृत विरचित कविताएं:
लेनिन स्तोत्रम् , नागार्जुन देशदशकम् , नागार्जुन शीते वितस्ता , नागार्जुन चिनार-स्मृतिः , नागार्जुन डल झील , नागार्जुन मिजोरम , नागार्जुन भारतभवनम् , नागार्जुन ।
बांग्ला की कविताएँ:
भावना प्रवण यायावर, अघोषित भारे, भाबेर जोनाकि, आमार कृतार्थ होयछी, आमि मिलिटारिर बूड़ो घोड़ा, निर्लज्य नाटक, की दरकार नाम-टाम बलार ।
पुरुस्कार
1. साहित्य अकादमी पुरस्कार -1969 (मैथिली में, 'पत्र हीन नग्न गाछ' के लिए)
2. भारत भारती सम्मान (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा)
3. मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार द्वारा)
4. राजेन्द्र शिखर सम्मान -1994 (बिहार सरकार द्वारा)
5. साहित्य अकादमी की सर्वोच्च फेलोशिप से सम्मानित
6. राहुल सांकृत्यायन सम्मान पश्चिम बंगाल सरकार सेे हिन्दी अकादमी पुरस्कार
नागार्जुन के व्यक्तित्व का आलोचनात्मक अध्ययन
व्यक्ति और साहित्य दो भिन्न नहीं है। किसी भी साहित्यकार का जीवन, मान्यता, भाव-भावना का प्रतिबिंब उनके साहित्य में दिखाई देता है। इसलिए साहित्यकार के कृतित्व को देखने से पहले व्यक्तित्व पर सोचना अनिवार्य है। व्यक्तित्व में परिवार, समाज, परिवेश का चित्रण होता है। व्यक्तित्व में व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है। उनकी आदतें, रूचियाँ, मनोवृत्तियाँ, प्रवृत्तियाँ, विशेषताओं का अंकन होता है। व्यक्तित्व और साहित्य अछूत नहीं होते अतः नागार्जुन का व्यक्तित्व भी इसके लिए अपवाद नहीं है। उस पर यहाँ हम विचार करेंगे। हिन्दी साहित्य में 'बाबा' के नाम से लोकप्रिय और मैथिली के प्रख्यात कवि और कथाकार 'नागार्जुन' का पूरा नाम है श्री वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री'। लेखकों, मित्रों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं में 'नागा बाबा' संस्कृत में 'चाणक्य' जैसे सम्मानसूचक नाम से पुकारे जानेवाले इस साहित्यकार का स्वभाव विद्रोही था। उन्हें घर के लोग 'ढक्कन मिसिर' नाम से पुकारते थे। इनसे पूर्व चार भाई-बहनों का शैशवकाल में ही देहान्त हो चुका था। अतः इनके पिता ने वैद्यनाथ धाम (देवधर) जिला संथाल परगना में जाकर पुत्र के दिर्घायु होने की मिन्नत की इसी के फल स्वरूप इनका नाम वैद्यनाथ रखा गया।
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का आंकलन बाह्य एवं आंतरिक इन्ही दो पहलुओं के आधार पर उसका किया जाता है। इस असाधारण रचनाकर का बाह्य व्यक्तित्व अत्यंत ही साधारण था।
बाह्य व्यक्तित्व :-
नागार्जुन की रहन-सहन सीधी-साधी थी और विचार उच्च थे। नागार्जुन के बाह्य व्यक्तित्व में कुछ भी ऐसा नहीं था जो कि उन्हें असाधारण सिद्ध कर सके। उनका साधारण मझोला कद तथा वर्ण श्याम है। वे मोटे खद्दर का कुर्ता तथा पजामा पहनते है। किसी भी प्रकार का दिखावा उन्हें पसन्द नहीं था। वे एक साधारण मनुष्य का जीवन व्यतित करते थे। उनके बाह्य पक्ष के बारे में डॉ. प्रकाशचंद्र भट्ट के शब्दों में, "दुबला-पतला शरीर, मोटे खद्दर का कुर्ता, पजामा, मझोला कद, आँखों पर ऐनक, पैरों में चप्पले, चेहरे पर उत्साह और पीड़ित वर्ग के प्रति व्यथा की मिली-जुली प्रतिक्रिया के भाव यहीं नागार्जुन है।" यही सत्य है। उनका खान-पान अत्यंत सादा था। वे शुध्द शाकाहारी थे। शोषित और पीड़ित जन के हिमायती। भ्रष्टाचार, राजनैतिक, धड़ेबाजी, आडम्बर और साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज उठानेवालों में नागार्जुन के व्यक्तित्व में सहजता और फक्कड़पन का जो भाव मिलता है, वह अन्यत्र कम ही मिलेगा।
साधारण बाहरी व्यक्तित्व वाले बाबा नागार्जुन का आंतरिक व्यक्तित्व बहुत ही आसाधारण था। उनकी स्स्दगी ही उन्हें आसाधारण बना देती थी। उनकी दैनिक आवश्यकताएं भी बेहद सीमित थीं, फिर भी वे मस्ती भरा जीवन जीते थे। अपनी ममत्व भावना, दूसरों को कष्ट न पहुचानें की प्रवृत्ति एवं आत्मसंतोष के कारण वे किसी को भी अपने परिवार के बुजुर्ग लगते थे। "उनका समूचा जीवन एक झोले में रहता था, कापी, पेन, एक दो छोटी डिबियायें, गमछा, एक पायजामा, अलीगढ़ कट जो सफेद न होकर कुछ बदरंगीपन लिए होता था। कुर्ता भी मोटी खादी का। दो चार दिन कहीं निकल जाते और जब लौटते तो बस वही झोला कांधे पर चिपका रहता।"
अंतरंग व्यक्तित्व :-
नागार्जुन के अंतरंग व्यक्तित्व निर्माणक तत्वों में तत्कालीन, राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियाँ मुख्य रही हैं जिसकी प्रतिक्रिया उनके सम्पूर्ण साहित्य में देखी जा सकती है। "जीवन की सादगी, सरलता, स्पष्टवादिता और खुलापन नागार्जुन के व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष की मूलभूत विशेषताएँ है।"" बचपन से ही विद्रोही और परम्परा भंजक के संस्कार उन पर थे। एकांत प्रेमी, स्वाभिमानी, आडम्बर और प्रदर्शन से बेहद नफरत आदि मूलभूत विशेषताएँ है। सहज जीवन के चितेरे नागार्जुन अपने व्यक्तिगत जीवन में जितने सहज तरीके से जीवन जीते है साहित्य में भी वह उतनी ही सहजता से अभिव्यक्त हुआ है।
समाज में व्याप्त वर्गभेद, जातिभेद, शोषण, उत्पीड़न ने उनकी सोचने की प्रक्रिया को अधिक तीव्र किया, इसी काम में कई बार उन्हें जेल भी जाना पडा। लेकिन वे जनहित के लिए अपने पथ से कभी नहीं हिले। नागार्जुन के व्यक्तित्व को निखारने में उनके व्यक्तिगत जीवन के कटु संघर्षों के अलावा उस प्रगतिशील और वैज्ञानिक विचार धन का योग भी है। जिनकी प्रारंभिक दिक्षा उन्हें स्वामी सहजानंद से मिली जिसके फलस्वरूप उनमें अदम्य जिजीविषा पैदा हुई तो सामाजिक व्यवहार ने उन्हें जन-सामान्य के अधिक निकट खडा किया।
नागार्जुनजी का जन्म, बचपन अभावग्रस्तता में बिता है। उन्होंने अपनी शिक्षा अधिकांश जीवन की विस्तृत पाठशाला में संपन्न की है। उन्होंने शिक्षा के बाद अपनी कलम चलाई और वैद्यनाथ मिश्र से 'नागार्जुन' बन गये। उन्होंने अपने साहित्य में जीवन की वास्तविकता का यथार्थ रुप में वर्णन किया है। उन्होंने उपन्यास, काव्य, कहानी, निबंध, संस्मरण, यात्रावर्णन, आदि लिखा है। उन्होंने उपन्यास और काव्य का लेखन अधिक किया है। उनके उपन्यासो में भारतीय जनजीवन का चित्रण मिलता है और भारतीय ग्रामजीवन की समस्या का वर्णन भी मिलता है। उनका उपन्यास 'रतिनाथ की चाची' पहला औचलिक उपन्यास है। इसमें विधवा स्त्री की करुण गाथा का चित्रण किया है। 'बलचनमा' उनका आंचलिक उपन्यास है इसमें जमीनदारी प्रथा और मजदूरों पर होने वाले अन्याय का चित्रण किया है। 'नई पौध' में अनमेल ब्याह और नई चेतना का वर्णन मिलता है। 'बाबा बटेसरनाथ' में एक वटवृक्षद्वारा जमीनदारी प्रथा और अंग्रेजों के शोषण नीति की कहानी कहीं गयी है। 'दुःखमोचन' में ग्रामसुधार एवं ग्राम विकास का चित्रण मिलता है। 'वरुण के बेटे' में मछुआ परिवारों की सुख-दुख, और वर्ग संघर्ष की कहानी है। 'कुंभीपाक' यह एक नागरी आँचलिक उपन्यास है। इसमें एक नारी की कहानी है। 'हिरक जयंती' एक व्यंग्यप्रधान कृति है, इसमें वर्तमान राजनीतिक तथा नेतागिरी पर करारा व्यंग्य किया है। 'उग्रतारा' यह उपन्यास बंदीगृह की पार्श्वभूमि पर आधारित है। 'अभिनन्दन' में भारतीय राजनीतिक स्थिति का खोखला और यथार्थ वर्णन किया है। नागार्जुन ने 'पारो' में अनमेल विवाह के परिणामों की चर्चा की है साथ ही विवाह की गलत परंपराओं की आलोचना की है। इसी तरह नागार्जुन ने उपन्यासों में जमीनदारी प्रथा, जमीनेदारोद्वारा शोषण, नारी शोषण, अंधश्रद्धा, रुढी परंपरा, अंग्रेजों का शोषण आदि का यथार्थरूप में चित्रण किया है। उन्होंने अपने युग की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक समस्याओं पर प्रकाश डाला है। नागार्जुन समाजवादी, यथार्थवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक होने के कारण शोषित समाज की पीडा और वर्ग-संघर्ष उनके उपन्यासों में पुरे आवेग के साथ उभरकर आया है।
सादे जीवन एवं परिवेश तथा प्रगतिशील विचारधाराने नागार्जुन के दृष्टिकोण को व्यापकता प्रदान की। सामान्यज ने के प्रति पक्षधरता इनके सम्पूर्ण साहित्य में अभिव्यक्त हुई है। नागार्जुन की सबसे बडी विशेषता हैं कि वे अनेक विविधताओं और सम्पन्नताओं के रचनाकार है। "ऐसा क्यों है कि हिन्दुस्थान के हर पड़ाव पर एक न एक नागार्जुन नजर आता है। यह सपने की बात नहीं, सच्चाई है कि बाबा नागार्जुन यहाँ की माटी में, यहाँ के जनसाधारण में कि इनको कहीं भी देखा जा सकता है।"" यहाँ पर स्पष्ट है कि नागार्जुन का व्यक्तित्व बहुत समृद्ध था।
नागार्जुन के कृतित्व का आलोचनात्मक अध्ययन
नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है। उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है। मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है। उनका गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है। नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं। उन्होंने आज़ादी के पहले और बाद में भी कई बड़े जनांदोलनों में भाग लिया था। 1939 से 1942 के बीच बिहार में किसानो के एक प्रदर्शन का नेतृत्व करने की वजह से जेल में रहे। आज़ादी के बाद लम्बे समय तक वो पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं। उनके कुछ काव्य शिल्पों में ताक-झाँक करना हमारे लिए मूल्यवान हो सकता है। उनकी अभिव्यक्ति का ढंग तिर्यक भी है, बेहद ठेठ और सीधा भी। अपनी तिर्यकता में वे जितने बेजोड़ हैं, अपनी वाग्मिता में वे उतने ही विलक्षण हैं। काव्य रूपों को इस्तेमाल करने में उनमें किसी प्रकार की कोई अंतर्बाधा नहीं है। उनकी कविता में एक प्रमुख शैली स्वगत में मुक्त बातचीत की शैली है। नागार्जुन की ही कविता से पद उधार लें तो कह सकते हैं-स्वागत शोक में बीज निहित हैं विश्व व्यथा के। भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है।
समकालीन प्रमुख हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश के अनुसार "यह जोर देकर कहने की ज़रूरत है कि बाबा नागार्जुन बीसवीं सदी की हिंदी कविता के सिर्फ 'भदेस' और मात्र विद्रोही मिजाज के कवि ही नहीं, वे हिंदी जाति के सबसे अद्वितीय मौलिक बौद्धिक कवि थे। वे सिर्फ 'एजिट पोएट' नहीं, पारंपरिक भारतीय काव्य परंपरा के विरल 'अभिजात' और 'एलीट पोएट' भी थे।" उदय प्रकाश ने बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व-निर्माण एवं कृतित्व की व्यापक महत्ता को एक साथ संकेतित करते हुए एक ही महावाक्य में लिखा है कि "खुद ही विचार करिये, जिस कवि ने बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया हो, राहुल सांकृत्यायन और आनंद कौसल्यायन जैसी प्रचंड मेधाओं का साथी रहा हो, जिसने प्राचीन भारतीय चिंतन परंपरा का ज्ञान पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और संस्कृत जैसी भाषाओं में महारत हासिल करके प्राप्त किया हो, जिस कवि ने हिंदी, मैथिली, बंगला और संस्कृत में लगभग एक जैसा वाग्वैदग्ध्य अर्जित किया हो, अपनी मूल प्रज्ञा और संज्ञान में जो तुलसी और कबीर की महान संत परंपरा के निकटस्थ हो, जिस रचनाकार ने 'बलचनमा' और 'वरुण के बेटे' जैसे उपन्यासों के द्वारा हिंदी में आंचलिक उपन्यास लेखन की नींव रखी हो जिसके चलते हिंदी कथा साहित्य को रेणु जैसी ऐतिहासिक प्रतिभा प्राप्त हुई हो, जिस कवि ने अपने आक्रांत निजी जीवन ही नहीं बल्कि अपने समूचे दिक् और काल की, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और व्यक्तित्व पर अपनी निर्भ्रांत कलम चलाई हो, (संस्कृत में) बीसवीं सदी के किसी आधुनिक राजनीतिक व्यक्तित्व (लेनिन) पर समूचा खण्डकाव्य रच डाला हो, जिसके हैंडलूम के सस्ते झोले में मेघदूतम् और 'एकाॅनमिक पाॅलिटिकल वीकली' एक साथ रखे मिलते हों, जिसकी अंग्रेजी भी किसी समकालीन हिंदी कवि या आलोचक से बेहतर ही रही हो, जिसने रजनी पाम दत्त, नेहरू, बर्तोल्त ब्रेख्ट, निराला, लूशुन से लेकर विनोबा, मोरारजी, जेपी, लोहिया, केन्याता, एलिजाबेथ, आइजन हावर आदि पर स्मरणीय और अत्यंत लोकप्रिय कविताएं लिखी हों -- ... बीसवीं सदी की हिंदी कविता का प्रतिनिधि बौद्धिक कवि वह है...।"
उपन्यासकार नागार्जुन :-
हिन्दी उपन्यास साहित्य में नागार्जुन का अपना विशिष्ट स्थान है। हिंदी उपन्यास में समाज के यथार्थ रूप का चित्रण प्रेमचंद युग से प्रारंभ हुआ। प्रेमचंद की इसी परम्परा को आगे बढ़ाने का कार्य नागार्जुन ने किया। निम्नवर्गीय समाज की वेदनाओं और उनकी समस्याओं के चितेरे नागार्जुन ने अपने उपन्यासों द्वारा हिन्दी उपन्यास साहित्य को समृद्ध किया है। ग्रामीण जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति इनकी विशेषता रही है। इनके उपन्यासों में मिथिला के ग्रामों में स्थित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों के अलावा तत्कालीन जनजीवन, पूँजीपतियों द्वारा होनेवाला शोषण, जमींदार-किसान संघर्ष एवं प्राकृतिक चित्रण का अंकन हुआ है। नागार्जुन मार्क्सवादी विचारों के समर्थक रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपने साहित्यिक कृतियों में मार्क्स सिद्धांतों का प्रयोग नहीं किया। यह एक उनकी विशेषतः रही है। इसके संदर्भ में ललित अरोरा का कथन है "उनके सारे रचनासंसार में अन्तसूत्र की तरह क्लासिकी मार्क्सवाद अवश्य मौजूद है। वह भी उनके बौद्ध दर्शन के अध्ययन संस्कारों के कारण करूणा, मैत्री और शान्तिप्रियता की मानववादी अन्तः धारा से बराबर सौम्य बनता गया है। आज नागार्जुन को किसी भी राजनीतिक पक्ष या मतवाद के 'लेबल' से परिभाषित करना कठीन है। वे दलित शोषित वर्ग के सच्चे हितैषी है।" इस प्रकार सच्चे अर्थों में पीड़ित, शोषित, दलित जनता के प्रतिनिधि नागार्जुन मानवता के सजग प्रहरी है।
कवि नागार्जुन :-
नागार्जुन हिन्दी काव्यधारा के उन प्रमुख स्तम्भों में है जिन्होंने कविता को रचा ही नहीं बल्कि उसको जीया भी। नागार्जुन का संपूर्ण कृतित्व प्रगतिशील चेतना का वाहक है। उनकी पद्य और गद्य दोनों की कृतियों में प्रगतिशीलता के विविध आयाम दिखाई देते है, जिनमें मध्यमवर्गीय जीवन तथा मजदूरों की जिन्दगी का संपूर्ण चित्रण यथार्थ रूप में मिलता है। जनकवि होने के कारण उनमें तरल संवेदनात्मक आवेग है इसलिए वे सीधे जनसाधारण से जुड जाते है। उन्होंने अपने समय की सभी समस्याओं का जिक्र अपने साहित्य में किया है। वे समस्याएँ चाहे राजनीतिक हो, आर्थिक हो या सामाजिक, एक युग की धडकन उनके साहित्य में है। नागार्जुन की पहली हिन्दी कविता 'राम के प्रति' 1935 में प्रकाशित हुई। तब से आज तक नागार्जुन की काव्यरचनाओं का संसार लगातार विकसित और संपन्न हुआ है। "कविता में नागार्जुन की दिलचस्पी का दायरा बहुत बडा है और बातों को छोड भी दें तो भाव बोध और मानवीय स्थितियों की जैसी विविधता उनके यहाँ है वैसी अन्यत्र नहीं, उनकी कविता एक तरह से अपनी सम्पूर्णता में, विगत चालीस वर्षों के भारतीय जीवन के उथल-पुथल की महागाथा है।"
कहानीकार नागार्जुन :-
इस निर्भीक जनकवि की प्रखर प्रतिभा दिनोदिन निखरती ही गई और साहित्य का सभी विधाओं में उनकी कलम हावी रही। कविता, उपन्यास, बालसाहित्य की तरह कहानी साहित्य में भी नागार्जुन ने अपनी कलम चलाई है। नागार्जुन की कहानियों में 1) असमर्थदाता 2) ताप हारिणी 3) विशाखा-मृगारमाता 4) ममता 5) आसमान के चंदा तेरे 6) भूख मर गई थी आदि कहानियाँ उपलब्ध है।
निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि नागार्जुन ने जीवन को उसके विविध रूपों में, जटिल संघर्षों को, राजनीतिक विकृतियों को, मजदूर आंदोलनों को, किसान-जीवन के सामान्य दुख-सुख को पहचानने और अभिव्यक्त करने का वृहत्तर सर्जनात्मक उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाया है। जिस प्रकार उनकी काव्य संरचना और कथ्य के स्तर पर वैविध्य है, वैसा ही वैविध्यमय उनका जीवन भी रहा है।
नागार्जुन के समग्र साहित्य पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है कि उनका साहित्य जीवन और जगत की वास्तविकता का एक विशिष्ट प्रतिफलन है। उनका साहित्य वास्तविक संसार का आलोचना और प्रतिबिंब भी है। यथार्थ का दर्पण, प्रगति की मशाल, सामाजिक प्रभाव और परिवर्तन का हथियार जिसकी शक्ति और प्रहार संजीवनी का काम करती है। उनके साहित्य में कलात्मकता मणिकांचन संयोग के साथ है। उनके साहित्य में विविध आयाम ऐसे स्तंभ है जिनका सम्मिलित प्रकाश एक अजर, अमर, ज्योति पुंज के रुप में मार्गदर्शन करता रहेगा। नागार्जुन के बारे में ऐसा कहना उचित होगा की हिंदी साहित्य में नागार्जुन का स्थान अद्वित्तिय है, उनका साहित्य हिंदी जगत की अमूल्य धरोहर है।
नागार्जुन के साहित्य अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि, उनका साहित्य जीवन और जगत के लिए 'प्राणवायु' का काम करता है, हर जीव बिना प्राणवायु के नहीं जी सकते उसी प्रकार यह हिन्दी साहित्य भी 'बाबा' के साहित्य के बिना मृत इन्सान की तरह हो सकता है। उनका साहित्य वास्तविक संसार का आलोचना और प्रतिबिम्ब भी है। सहज जीवन के चितेरे नागार्जुन अपने व्यक्तिगत जीवन में जितने सहज तरीके से जीवन जीते है साहित्य में भी वह उतनी ही सहजता से अभिव्यक्त होते है। उनके साहित्य में कलात्मकता मणिकांचन संयोग के साथ है। नागार्जुन की हर साहित्यिक कृति विविधताओं और सम्पन्नताओं से ओत-प्रोत है। नागार्जुन ने अपने कविता के जरिए समाज में व्याप्त बुराइयों, भ्रष्टाचार, बढ़ती अनैतिकता, राजनैतिक और आर्थिक विसंगतियों पर निरन्तर प्रहार किया है। निम्नवर्गीय समाज की स्थितियों का चित्रण तथा उनकी समस्याओं को संवेदनात्मक धरातल पर प्रस्तुत करने का श्रेय नागार्जुन को है। नागार्जुन हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों में प्रमुख हैं जिन्होंने अपनी सर्जना में सामान्य जन के ऐसे सहज जीवन चित्र प्रस्तुत किये है जहाँ शास्त्रीय और अति साहित्यिकता का आतंक नहीं है। अतः हिन्दी साहित्य के चरमकोटी के साहित्यकार नागार्जुन को माना जाए तो यह अनुचित नहीं होगा। हिन्दी साहित्य में उनका स्थान अद्वितीय है, उनका साहित्य हिन्दी साहित्य जगत में उगते सूर्य की तरह प्रकाशमान है।
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