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कहानी तत्वों के आधार पर परिंदे कहानी की समीक्षा

कहानी तत्वों के आधार पर परिंदे कहानी की समीक्षा


निर्मल वर्मा की परिंदे कहानी एक उत्कृष्ट रचना है जो पाठक को भावुक और विचारशील बनाती है। इस कहानी का तात्विक विश्लेषण हमें इसके विभिन्न आयामों को समझने में मदद करता है। यह कहानी हमें जीवन के सार को समझने में मदद करती है और हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती है।
प्रेमचन्द के पश्चात् जैनेन्द्र और अज्ञेय तक आते-आते हिन्दी कहानी अन्तर्मुखी हो चुकी थी और उसमें पुरुष के साथ-साथ (बल्कि उससे भी अधिक) नारी-मन को चित्रित किया जाने लगा था। नये युग के कहानीकारों ने इस प्रवृत्ति को और भी अधिक आगे बढ़या। श्री राजेन्द्र यादव 'एक दुनिया समानान्तर' ने इस सम्बन्ध में ठीक कहा है "जिन्दगी में सभी कुछ मधुर-मृदुल या 'गुड़ी-गुडी' नहीं होता, मजबूरियाँ भी हैं, विद्रोह भी हैं और सबकी जिन्दगियाँ एक-दूसरे से उलझी-बँधी भी हैं। कभी उसे (नारी को) शरीर की माँग झुका देती है तो कभी अकेलेपन की यातना।" इस अकेलेपन की यातना को मुखर करने वाले प्रमुख कथाकारों में से एक प्रमुख नाम है-निर्मल वर्मा और प्रमुख कहानी है-' परिंदे'।
परिंदे कहानी एक ओर तो कहानी-कला की दृष्टि से उत्तम है ही और दूसरी ओर लेखक की कहानी- कला का प्रतिनिधित्व भी करती है। स्वयं लेखक ने भी इसको विशेष महत्व की रचना माना है। प्रमाण है इसी कहानी के नाम पर उनके एक कहानी संग्रह (परिन्दे) का नामकरण किया जाना। कहानी-कला की दृष्टि से की गयी प्रस्तुत कहानी की समीक्षा भी इसके 'महत्व' और 'विशेषत्व' की उद्घोषणा करती है।

निर्मल वर्मा जी का सामान्य परिचय 

(जन्म 3 अप्रैल 1929 - 25 अक्टूबर 2005 नई दिल्ली)
निर्मल वर्मा का जन्म 3 अप्रैल 1929 को शिमला में हुआ था। आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। हिंदी कहानी में आधुनिक बोध लानेवाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है। उन्होंने कम लिखा है, परन्तु जितना लिखा, उतने से ही वे बहुत अधिक ख्याति पाने में सफल हुए। निर्मल वर्मा की कहानियाँ अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती है। निर्मल वर्मा को प्रायः स्मृति का कहानीकार माना गया है। 1956 ई. में परिदें कहानी का प्रकाशन होता है। इसी नाम से उनका कहानी संग्रह भी है जिसमें कुल 7 कहानियाँ हैं- अंधेर में, तीसरा गवाह, डायरी का खेल, माया का मर्म, पिक्चर पोस्टकार्ड, सितंबर की एक शाम और इस संग्रह की अंतिम कहानी परिंदे है।

कहानी का सारांश 

'परिंदे' निर्मल वर्मा की सशक्त कहानियों में से एक है। 'परिन्दे' कहानी-संग्रह की यह अंतिम कहानी है और इसका शीर्षक प्रतीकात्मक है, जिससे आधुनिक मानव की नियति को पकड़ने की कोशिश किया गया है। जहाँ सभी मनुष्य किसी-न-किसी के लिए प्रतीक्षित हैं। कहानी की नायिका लतिका इस कहानी का केन्द्र बिन्दु है। वह एक पहाड़ी स्कूल में वार्डन है। वह कुमाऊँ के कॉन्वेन्ट स्कूल में शिक्षिका भी है। मिस्टर ह्यूबर्ट, डॉ. मुकर्जी और मिस वुड आदि उसके साथ उस स्कूल में शिक्षक हैं। कहानी में उस समय का ज़िक्र है, जब सर्दी की छुट्टियाँ होने वाली हैं और होस्टल खाली होने का समय आ गया है। पिछले दो-तीन सालों से मिस लतिका होस्टल में ही रह रही हैं और डाक्टर मुकर्जी छुट्टियों में कहीं नहीं जाते, डाक्टर तो सर्दी-गर्मी में भी यहीं रहते हैं।
कहानी की नायिका लतिका कॉनवेन्ट के स्कूल के होस्टल के रंगीन वातावरण में अकेलेपन के संत्रास में जी रही है। कुछ वर्ष पूर्व उसके जीवन में ऐसा घटित हो चुका है जिसे वह चाहकर भी विस्मृति नहीं कर पा रही है। कुमाऊँ रेजिमेंट सेंसर के कैप्टन गिरीश नेगी से लतिका ने प्रेम किया था और युद्ध के कारण उन्हें कश्मीर जाना पड़ा। उसके बाद गिरीश नेगी लौट नहीं सके। प्लेन-दुर्घटना में गिरीश की मृत्यु हो चुकी है। पर अब भी लतिका उसे भूल नहीं पाती। वह मेजर गिरीश के साथ गुज़ारे दिनों की स्मृतियों को अपना साथी बना, कॉनवेन्ट स्कूल में नौकरी करते हुए दिन व्यतीत करती है।
मिस्टर ह्यूबर्ट ने एक बार लतिका को प्रेम पत्र लिखा था। लतिका को उसके इस बचकाना हरकत पर हँसी आयी थी, किन्तु भीतर-ही-भीतर प्रसन्नता भी हुई थी। ह्यूबर्ट का पत्र पढ़कर उसे क्रोध नहीं आया, आयी थी केवल ममता। लतिका को लगा था कि वह अभी इतनी उम्रवाली नहीं हो गई कि उसके लिए किसी को कुछ हो ही न सके। लेकिन फिर भी उसे नहीं लगता कि उसे वैसी ही अनुभूति अब किसी के लिए हो पाएगी। लतिका अपने बीते दिनों की दुःखद घड़ियों को भूलना चाहती है, लेकिन इस भूलने की प्रक्रिया में वे उन्हीं चीज़ों को और याद करती हैं, जिसे वे भूलना चाहती हैं। इस तथ्य को वह समझती भी है- "लतिका को लगा कि जो वह याद करती है, वही भूलना भी चाहती है, लेकिन सचमुच भूलने लगती है, तब उसे भय लगता है कि जैसे कोई उसकी किसी चीज को उसके हाथों से छीने लिये जा रहा है, ऐसा कुछ जो सदा के लिए खो जाएगा।"
डॉक्टर मुखर्जी 'परिन्दे' का सर्वाधिक जीवन्त पात्र है। लेकिन मानव नियति के वे भी लतिका की तरह शिकार हैं। पहाड़ी जीवन एवं प्रैक्टिस के बारे में मिस वुड से वह कहता है- "प्रैक्टिस बढ़ाने के लिए कहाँ-कहाँ भटकता फिरूँगा, मिस वुड। जहाँ रहो वहीं मरीज मिल जाते हैं। यहाँ आया कुछ दिनों के लिए- फिर मुद्ध हो गई और टिका रहा। जब कभी जी ऊबेगा, कहीं चलता जाऊंगा। जड़ें कहीं नहीं जमतीं, तो पीछे भी कुछ नहीं छूट जाता। मुझे अपने बारे में कोई गलतफहमी नहीं है मिस वुड, मैं सुखी हूँ।" डॉक्टर मुखर्जी का एक दूसरा रूप भी है जब वे कहते हैं कि लतिका तो बच्ची है, मरनेवाले के साथ मरा थोड़े ही जाता है।
ह्यूबर्ट अपने हृदय की सम्पूर्ण भावनाओं के साथ लतिका को प्रेम करता है। लतिका के अचेतन मन में भी ह्यूवर्ट के प्रति सहानुभूति और आकर्षण है। कहानी में यह तथ्य बाहर भी आता है- "ह्यूबर्ट के स्वर में व्यथा की छाया लतिका से छिपी न रह सकी। बात को टालते हुए उसने कहा- आप तो नाहक चिन्ता करते हैं, मि. ह्यूबर्ट! आजकल मौसम बदल रहा है, अच्छे भले आदमी तक बीमार हो जाते हैं। ह्यूबर्ट का चेहरा प्रसन्नता से दमकने लगा। उसने लतिका को ध्यान से देखा।" कहानी में अपने परिवार से छूटा हुआ डॉक्टर भी अकेला है। वह कहानी के प्रेमी चरित्रों के बीच हल्का-हल्का संबन्ध-सूत्र बनकर ही मूल संवेदना के साथ जुड़ता है।
जिस दिन मि. ह्यूवर्ट लतिका से माफी मांगते हैं, उसी रात डॉक्टर मुखर्जी उसे अचेतनावस्था में मिलते हैं। मि. ह्यूवर्ट वेहोशी में यही बड़बड़ाते रहते हैं- "इन ए बैक लेन ऑफ द सिटी, देयर इज ए गर्ल हू लब्ज मी... ह्यूवर्ट हिचकियों के वीच गुनगुना उठता था।" 'परिन्दे' टूटे हुए प्रेम के प्रतिक हैं।
मिस वुड प्रंसिपल हैं अक्सर छुट्टियो में इनका रूम खाली रहता है। लतिका कभी-कभी इनके खाली कमरे में चोरी-चुपके सोने चली जाया करती थी क्योंकि मिस वुड का कमरा बिना आग के भी गर्म रहता था।
लतिका आखिरी चक्कर लगाने के लिए निकलती है, और अन्त में सोचकर कि शायद जूली का प्रथम परिचय ही हो, वह उसका खत उसके तकिये के नीचे रख आती है। जूली होस्टल की लड़की है जो किसी फौजी से प्रेम करती है और उसका पत्र लतिका को मिल जाता है।
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कहानी तत्वों के आधार पर समीक्षा

कथावस्तु

कथा का प्रारम्भ होता है-लतिका से। लड़कियों के एक ईसाई विद्यालय की अध्यापिका लतिका अकेली थी अपने आप में बिल्कुल अकेली। घर से दूर, होस्टन में रहने वाली लतिका 'घर' और 'घरवालों' के लिए तरसती है। कभी उसने कैप्टिन गिरीश नेगी से प्रेम किया था, जो नेगी के चले जाने से परवान न चढ़ सका किन्तु वह फिर कभी किसी और से प्रेम न कर सकी। कारण था मिस्टर नेगी के प्रति वह अटकाव, वह आकर्षण, जो उसके बाद भी उसे मथे डालता था। अतीत का यह स्मृति-धुन्ध उसको बिल्कुल एकाकी बना देता है - तन-मन दोनों से। छुट्टियों में भी होस्टन में रहना, पिकनिक पर तटस्थ बने रहना, मि० ह्य बर्ट के प्रेम-प्रस्ताव को ठुकराना, जूली के प्रेम पर चिढ़ना और अन्त में समर्पण-पत्र लौटा देना आदि इसी के सूचक हैं, परिणामस्वरूप 'परिन्दे' की भाँति लतिका भी सम्पर्कों के लिए ललकती किन्तु सम्पर्कों से कटी नारी बनकर रह जाती है।
प्रस्तुत कथा से स्पष्ट है कि यह एक विशेष मूड और मनःस्थिति की कहानी है जिसे कुछ विशेष क्षणों में भोगा-परखा जा सकता है। इसकी मुख्य कथावस्तु कान्वेण्ट स्कूल के होस्टल, पहाड़ी कस्बे के ईसाईयत में डूबे वातावरण की है-जिसमें लतिका भी अपने अतीत की स्मृतियों की मधुर वेदना लिए जीवन व्यतीत कर रही है। घटनाएँ अपेक्षाकृत कम हैं। केवल लतिका का राउण्ड लेना, ह्यबर्ट का संगीत सुनना, चर्च में प्रार्थना और पिकनिक आदि ही बाहरी घटनाएँ हैं। लेखक का सारो ध्यान मानसिक स्मृतियों और अन्तर्द्वन्द्वों में लगा है। इसी प्रकार घटनायें बाह्य कम और मानसिक अधिक हैं जिनको स्मृति जैसे माध्यमों से सम्बद्ध किया गया है। आधुनिक सन्दर्भों में निरन्तर अकेले होते जा रहे व्यक्ति (लतिका) के अन्तर्मन की अनुभूतियों से युक्त यह कथावस्तु स्वाभाविक, रोचक और अदृश्य यथार्थ से परिपूरित दृष्टिगोचर होती है।

चरित्र चित्रण 

परिंदे कहानी में कुल मिलाकर आठ चरित्र हैं- लतिका, ह्यबर्ट, गिरीश नेगी, डॉ० मुखर्जी, मिस वुड, फादर एलमण्ड, करीमुद्दीन और जूली। सभी चरित्र एक विशेष वर्ग और वातावरण (ईसाईयत से परिपूर्ण वर्ग के वातावरण) से आये हैं जहाँ हर पात्र अंग्रेजियत के रंग में रंगा है। इनमें भी प्रधानता है- लतिका कीं। जैसा कि डॉ० महेन्द्र प्रताप (हिन्दी कहानी : 15 पगचिह्न) ने कहा है-"लतिका जिस मनःस्थिति में जीती है, उसके माध्यम से हम स्वातन्त्र्योत्तर भारतीय समाज में निरन्तर संक्रमित होते हुए बिखराव के बिन्दुओं को जान सकते हैं।" कहानीकार ने उसके माध्यम से, आधुनिक समाज में सम्पर्कों के लिए ललकती किन्तु सम्पर्कों से कटी उस नारी का चित्रण किया है जो अपने ही एकान्त में पिंजरे में बन्द परिन्दे की तरह छटपटाती है।
सभी चरित्र कथानुकूल तो हैं ही, स्वाभाविक स्वतन्त्र व्यक्तित्व से युक्त और वर्तमान नगरीय जीवन से सम्बन्धित भी हैं। लेखक ने उसके चरित्रांकन में प्रधानता निःसन्देह आन्तरिक पक्ष को दी है। लतिका और मि० ह्यबर्ट के चरित्र इसके सर्वोत्तम प्रमाण हैं। हल्की भावुकता, रोमानियत और किंचित आदर्श भी इनमें मिलता है। सभी विशेषकर, लतिका और मि० ह्यबर्ट अन्तर्मुखी हैं और प्रेम की निराशा, असफलता, स्मृतिग्रस्त कुण्ठाओं आदि दुविधाओं से ग्रस्त हैं। इसलिए वे कथा में वैयक्तिक अधिक बन गये हैं। इनके चरित्रांकन में कहानीकार ने वर्णन परिचय (यथा ह्यबर्ट का पूर्व परिचय), संवाद (ह्यबर्ट मुखर्जी संवाद), क्रियाकलाप (जूली, मिस वुड आदि के कार्य) तथा सबसे अधिक प्रतीक (यथा अवसाद पर संगीत, पूर्व स्मृतियाँ, परिन्दों का उड़ना, धुन्ध, कोहरा आदि) विभिन्न साधनों का प्रयोग किया है।

संवाद योजना

घटनाओं की कमी अंतर्मुखी चरित्रों की प्रधानता एवं संकेत शैली की प्रमुखता के कारण प्रस्तुत कथा में संवादों का अवसर अपेक्षाकृत कम है! फिर भी सभी प्रयुक्त संवाद पूर्णरूप से गुणयुक्त बन पड़े हैं। वे कथा के विकास और चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन तो करते ही हैं, साथ ही वातावरण निर्माण में भी सहायता करते हैं। व्यंजकता उनका सबसे बड़ा गुण है। कथा और पात्रादि की अनुकूलता के कारण तो उनमें आंग्ल शब्दावली की बहुलता तक आ गयी है और अन्तर्मुखी स्थिति की प्रमुखता के कारण स्वगत भी पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। जूली- लतिका, लतिका-ह्यबर्ट, लतिका-गिरीश और मिस वुड फादर एलमण्ड आदि के संवादों में ये विशेषतायें आसानी से दृष्टिगत की जा सकती हैं।

वातावरण

परिंदे कहानी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। बाह्यतः कहानी का वातावरण रानीखेत जैसे एक छोटे से पहाड़ी कस्बे का है जहाँ सब कुछ ईसाईयत और अंग्रेजियत से रँगा हुआ है। यहाँ तक कि, "कहानी में एक वातावरण छाया है जो पात्रों की आन्तरिक गतियों और मनःस्थितियों को व्यक्त करता है या प्रत्येक पात्र अपने वातावरण की सम्पृक्त उपज है।" इस कहानी का आस्वाद इस वातावरण की सम्पृक्ति के धरातल पर ही सम्भव है। एक विशेष दृष्टव्य बात, श्री धनंजय वर्मा के शब्दों में - "परिन्दे का वातावरण और चित्रण विदेशी सा लगेगा, क्योंकि वह सामान्यतः परिचित भारतीय वातावरण से एकदम भिन्न एक विशिष्ट परिवेश का है अन्यथा अनुभूतियों और संवेदनाओं में वह किसी भी कोण से विदेशी नहीं है।" दूसरे शब्दों में, बाह्यतः वातावरण परिवेश विदेशी है। कान्वेन्ट स्कूल का होस्टल, चर्च, कॉफी-मदिरा आदि की प्रचुरता, अँग्रेजी से भरे-पूरे संवाद, भाषा आदि सभी इसको 'विदेशी' बना देते हैं। दूसरी ओर मि० ह्य बर्ट का मृत पत्नी की याद करते रहना, लतिका के सम्मुख असफल प्रेम प्रस्ताव एवं लतिका का भावाकुल स्थिति में आंतरिक कुण्ठाओं से ग्रस्त रहना, पूर्व स्मृतियों में खोये रहना, अभावों को करते रहना क्या इसको भारतीय (बल्कि कहिये मानवीय) नहीं बना देते ? कहना न होगा कि समस्त वातावरण पूर्णतया यथार्थ, और फलस्वरूप विश्वसनीय बन पड़ा है। श्री धनंजय वर्मा ने ठीक ही कहा है - "यथार्थ के जिस स्तर को उन्होंने पकड़ा है, जिस वातावरण की बात वे करते हैं, उस स्तर और वातावरण में डूबकर, भीगकर वे लिखते हैं और फलस्वरूप डुबोते और भिगोते भी हैं।"

उद्देश्य

परिंदे कहानी का प्रधान उद्देश्य है (लतिका के माध्यम से) आधुनिक समाज की सम्पर्कों के लिए ललकती और सम्पर्कों से कटी नारी और उसकी आन्तरिक घुटन का यथार्थ चित्रण करना। साथ ही साथ प्रेम और तद्धनित कुण्ठाओं का दिग्दर्शन, वर्ग विशेष (आंग्ल भारतीय) के अन्तर्बाह्य वातावरण को मुखर करना एवं सबसे अधिक 'एक विशेष मूड और मनःस्थिति - असफल प्रेम के कुण्ठाग्रस्त मानस का प्रकटीकरण' आदि प्रस्तुत कहानी के अन्य उद्देश्य कहे जा सकते हैं! धनंजय वर्मा का यह कथन अक्षरशः सत्य है -"यहाँ केवल एक मुखर चिन्तन है जिसके माध्यम से अकेलेपन की परतें और स्तर-स्तर खुलते जाते हैं। वे स्तर जो जिन्दगी के व्यावहारिक पक्ष में नहीं खुलते, जो उससे पृथक् सार्थकता-असार्थकता की अनुभूति के निविड़ क्षणों में मुखर होते हैं।"

भाषा शैली

परिंदे कहानी की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है उसका कथा, पात्र और वातावरण के अनुकूल होना। आंग्ल परिवेश की इस कथा की भाषा में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से, और अत्यधिक किया गया है। साथ ही साथ हिन्दी की सरल व्यावहारिक शब्दावली (यथा गपशप, हँसी-मजाक, कटकटाना), उर्दू (यथा जंबर, बावजूद, पाबन्दी) तथा तत्समपरक हिन्दी (यथा ताम्रवर्णित, लक्षित, स्वप्निल, ऊर्मियाँ, विस्मित) आदि भी यथास्थान आये हैं। कहीं कहीं सूक्तियाँ (यथा' सब लड़कियाँ एक जैसी होती हैं- बेवकूफ और सेण्टीमेण्टल' तथा मुहावरे किरकिरा करना, दम रोके जोड़-हिसाब करना, स्वर्ग बनाना, चेहरा लाल होना आदि) भी इस स्वाभाविक बना देते हैं। जहाँ तक शैली का प्रश्न है उसमें वर्णन (अँधेरे कॉरीडोर गया), संवाद (यथा लतिका - गिरीश संवाद), पूर्व-स्मृति (यथा लतिका और ह्यबर्ट का पूर्व- स्मृतियों में खोना), काव्यात्मक (यथा प्रकृति वर्णन) संकेत अथवा प्रतीक (यथा परिन्दे, धुन्ध आदि) विविध शैलियों का मिश्रित रूप है।

नामकरण

परिंदे कहानी का नाम केवल एक सरल शब्द का होने के कारण संक्षिप्त और सरल है। साथ ही साथ यह मुख्य पात्र (लतिका की स्थिति) से सम्बन्धित, व्यंजक और कौतूहलपरक भी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है प्रतीकात्मकता। श्री धनंजय वर्मा के शब्दों में- "वह (लतिका) परिन्दों को उड़ता हुआ देखकर अपने मन की कामना की आपूर्ति और अभाव को झेलती है। जैसे कोई पक्षी अपनी सुस्ती मिटाने के लिए झाड़ियों के किनारे बैठ जाता, पानी में सिर डुबाता, फिर ऊबकर हवा में दो-चार निरुद्देश्य चक्कर काटकर दुबारा झाड़ियों में दुबकता है, ऐसे ही वह भी लड़कियों के साथ मीडोज में पिकनिक कर लेती है, प्रेयर में पियानो सुन लेती है, पुरानी स्मृतियों के शीतल जल में कुछ देर डूबकर फिर अपने ही एकांत में दुबक जाती है। अपने ही एकान्त में बन्द परिन्दे की तरह छटपटाती है।"

निष्कर्ष

परिंदे मूलतः प्रेम कहानी है, कहानी में प्रेम के प्रति जितना तीब्र सम्मोहन है उतना ही उस सम्मोहन से मुक्ति होने की अकुलाहट भी। 'परिंदे' कहानी में निर्मल की मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ भी काफी उभर कर सामने आई है। कहानी की नायिका लतिका अपने प्रेमी- कैप्टन नेगी की मृत्यु के बाद एक पहाड़ी स्कूल में अकेलेपन की जिंदगी गुजार रही है। अपने सहकर्मी डॉ. मुकर्जी के काफी प्रेरित करने पर भी वह दूसरा संबंध नहीं बना पाती, अपनी स्थिति से निकल नहीं पाती।
लतिका ही नहीं मि. ह्युबर्ट, मुकर्जी आदि सभी पात्रों की अपनी एक व्यक्तिगत परिस्थिति है, जिसका समाधान सभी चाहते हैं, लेकिन न ढूँढ़ पाने के कारण एब्सर्ड के शिकार हैं। सभी का जीवन एक ही प्रश्न का उत्तर खोज रहा है- 'हम कहाँ जाएँगे?' यही वह प्रश्न है जो कहानी के केंद्र में शुरू से अंत तक बना हुआ है और बिना किसी प्रत्यक्ष या ठोस समाधान के बना ही रह जाता है।
'परिंदे' कहानी में पात्रों को अपनी चेतना से भी जूझते हुए दिखाया तया है। सभी पात्र अपनी वास्तविक चेतना को परे हटाकर एक कृत्रिम चेतना या छद्म चेतना के सहारे अपना जीवन-यापन करते हैं और उनकी यह छद्म चेतना ही उन्हें बार-बार अपने अतीत से साक्षात्कार कराती है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि परिंदे कहानी, कहानी-कला की दृष्टि से सफल है और लेखक की कहानी-कला का प्रतिनिधित्व भी करती है। मूलतः यह भाव विशेष और मनःस्थिति विशेष की कहानी है जिसमें क्षण-विशेष की पकड़ और आश्चर्यचकित कर देने की प्रवृत्ति है जो इसको जैनेन्द्रीय कहानियों से अलग कर देती है। यहाँ वस्तु, चरित्र, यथार्थ-दृष्टि, भाषा, वातावरण सबके सब उस एक व्यक्ति के ही मूड में केन्द्रित हैं और उसी में डूबते से हैं एक भावाकुल मूड में। अतएव मुख्यतः एक विशेष मूड और मनःस्थिति की कहानी है और 'बादलों के घेरे' (कृष्णा सोवती), गुलकी बन्नो (धर्मवीर भारती), 'क्षय' (मन्नू भंडारी), 'छुट्टी का एक दिन' (उषा. प्रियंवदा), 'जानवर और जानवर' (मोहन राकेश), 'नन्हों' (शिवप्रसाद सिंह) आदि की परम्परा में आती है।
धन्यवाद


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