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भारतीय साहित्य का महत्व



भारतीय साहित्य का अर्थ है भारतीय उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषाओं में रचित सभी प्रकार की लिखित और मौखिक रचनाएँ, जिनमें कविता, कहानी, नाटक और अन्य रचनात्मक कार्य शामिल हैं। यह दुनिया की सबसे पुरानी साहित्यिक परंपराओं में से एक है और इसमें संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, और अन्य कई भाषाओं के साहित्य भी शामिल हैं। भारतीय साहित्य वह विशाल और समृद्ध साहित्यिक परंपरा है, जो भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित काव्य, गद्य, नाटक, कथा, दर्शन, धर्म, इतिहास, और लोककथाओं का संगठित रूप है। यह साहित्य भारतीय सभ्यता, संस्कृति, समाज और मानव जीवन के विविध पहलुओं का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो —
भारतीय साहित्य वह साहित्य है जो भारत की भाषाओं में लिखा गया हो यह भारत के उपमहाद्वीप में प्राचीन काल से लेकर अब तक, विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में रचित मौखिक और लिखित साहित्य को संदर्भित करता है और जिसमें भारतीय जीवन, संस्कृति, भावनाएँ, परंपराएँ और चिंतन झलकता हो।

भारतीय साहित्य का महत्व

भारतीय साहित्य विश्व के प्राचीनतम और समृद्धतम साहित्यिक परंपराओं में से एक है। इसका इतिहास हजारों वर्षों पुराना है, जो न केवल भाषा, संस्कृति और समाज के विकास का दर्पण रहा है, बल्कि मानव जीवन के गहनतम अनुभवों, मूल्यों और आदर्शों का संवाहक भी है। भारतीय साहित्य की विशिष्टता यह है कि इसमें धर्म, दर्शन, काव्य, इतिहास, राजनीति, समाज, लोकजीवन और मानव संवेदनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा का प्रतिबिंब है।
भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है, जहाँ विभिन्न भाषाओं में समृद्ध साहित्यिक धरोहर विकसित हुई। संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, हिंदी, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम आदि भाषाओं ने भारतीय साहित्य को अपनी विशिष्ट पहचान दी। हर भाषा ने अपने साहित्य में उस क्षेत्र की लोकसंस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों को प्रकट किया। यही कारण है कि भारतीय साहित्य को एकता में विविधता का प्रतीक माना जाता है। भारतीय साहित्य के प्रारंभिक रूपों में वैदिक साहित्य का विशेष स्थान है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद न केवल धार्मिक ग्रंथ हैं, बल्कि उनमें मानव जीवन के दार्शनिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहलुओं का भी वर्णन मिलता है। वेदों में निहित ऋचाएँ, उपनिषदों में समाहित ज्ञान, और ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्याएँ भारतीय चिंतन की गहराई को दर्शाती हैं। वेदों से लेकर उपनिषदों तक का साहित्य मानव आत्मा और ब्रह्म के संबंध की खोज में निरंतर अग्रसर रहा।
महाकाव्य काल में रचित रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि वे भारतीय समाज की नैतिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना के केंद्र हैं। वाल्मीकि की रामायण मर्यादा, धर्म और आदर्शों की कथा है, जबकि व्यास की महाभारत जीवन के संघर्ष, कर्तव्य, नीति और धर्मसंकट की गहन विवेचना प्रस्तुत करती है। इन ग्रंथों ने न केवल साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय जीवनदर्शन की नींव को भी मजबूत बनाया।
मध्यकाल में भारतीय साहित्य ने भक्ति आंदोलन के माध्यम से एक नई दिशा प्राप्त की। इस युग में कबीर, तुलसीदास, मीरा, सूरदास, रैदास, नानक, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, नरसी मेहता जैसे कवियों और संतों ने भक्ति को जनभाषा में अभिव्यक्त किया। इनकी रचनाओं ने न केवल साहित्यिक सौंदर्य प्रदान किया, बल्कि सामाजिक और धार्मिक समानता का संदेश भी दिया। भक्ति साहित्य ने समाज को जाति-पांति और संकीर्णता से ऊपर उठने की प्रेरणा दी। तुलसीदास का रामचरितमानस और सूरदास का सूरसागर साहित्य की अमर निधियाँ हैं, जिन्होंने जनमानस में नैतिकता, करुणा और प्रेम की भावना जगाई। भारतीय साहित्य में केवल धार्मिक या दार्शनिक भाव नहीं हैं, बल्कि उसमें लोकजीवन की झलक भी मिलती है। लोककथाएँ, लोकगीत, लोकनाट्य, और लोककविता भारतीय जनजीवन की आत्मा हैं। लोकसाहित्य ने ग्रामीण समाज के अनुभवों, आस्थाओं, दुख-सुख, और जीवन दृष्टि को सहज भाषा में प्रस्तुत किया। इस साहित्य ने यह सिद्ध किया कि सृजन केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि जन-जन के जीवन में रचनात्मकता और संवेदना विद्यमान है।
आधुनिक युग में भारतीय साहित्य ने समाज-सुधार, राष्ट्रीयता और मानवता के नए आयाम जोड़े। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में भारत में सामाजिक जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव से साहित्य का स्वर बदल गया। बंगला साहित्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, और मराठी में लोकमान्य तिलक जैसे रचनाकारों ने साहित्य को राष्ट्र की चेतना से जोड़ा। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों ने भारतीय समाज की वास्तविक समस्याओं—गरीबी, शोषण, अन्याय—को साहित्य के केंद्र में रखा।
स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय साहित्य ने व्यक्ति और समाज के जटिल संबंधों, अस्तित्वगत संघर्षों और बदलते मूल्यों की पड़ताल की। यह साहित्य केवल आदर्शों का नहीं, बल्कि यथार्थ का भी दर्पण बन गया। अज्ञेय, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, शेखर जोशी, मन्नू भंडारी, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम जैसे लेखकों ने मनुष्य के भीतरी संघर्ष, सामाजिक विषमताओं और नैतिक दुविधाओं को नई भाषा और दृष्टि दी।
भारतीय साहित्य का महत्व केवल ऐतिहासिक या सांस्कृतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आज भी इसकी प्रासंगिकता उतनी ही गहरी है। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है, हमारे संस्कारों और परंपराओं की स्मृति कराता है। साहित्य मानवता के प्रति संवेदनशीलता जगाता है, सह-अस्तित्व और करुणा का भाव उत्पन्न करता है। जब समाज में विभाजन, हिंसा और असहिष्णुता बढ़ती है, तब साहित्य ही वह शक्ति है जो मनुष्यता को जीवित रखती है।
भारतीय साहित्य ने विश्व साहित्य को भी गहरा प्रभाव दिया है। संस्कृत नाट्य, दर्शन, और काव्य परंपरा ने यूनानी, फारसी और बाद में यूरोपीय साहित्य पर भी अपनी छाप छोड़ी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, जिसने भारतीय साहित्य को विश्वपटल पर सम्मान दिलाया। इसके बाद अनेक भारतीय लेखकों—आर. के. नारायण, अरुंधति रॉय, सलमान रुश्दी, झुम्पा लाहिड़ी, अमिताव घोष—ने अंग्रेज़ी में लिखकर भारत की विविधता, संघर्ष और सौंदर्य को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया।
भारतीय साहित्य का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसकी नैतिक और दार्शनिक दृष्टि है। यहाँ साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। भारतीय कवियों और लेखकों ने सदैव “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना को आगे बढ़ाया। यह साहित्य हमें सिखाता है कि मनुष्य का सच्चा मूल्य उसकी संवेदनशीलता, करुणा और न्यायप्रियता में निहित है। भारतीय साहित्य का महत्व शिक्षा के क्षेत्र में भी अत्यंत है। यह न केवल भाषा के ज्ञान को समृद्ध करता है, बल्कि विचारों को व्यापक बनाता है। साहित्य के माध्यम से विद्यार्थी अपने देश की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ता है, नैतिक मूल्यों को समझता है और मानवीय दृष्टिकोण विकसित करता है। साहित्य व्यक्ति को विवेकशील और सहानुभूतिपूर्ण नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।
आज के तकनीकी और वैश्विक युग में, जब जीवन की गति तेज़ हो गई है और मानवीय संबंध कृत्रिम होते जा रहे हैं, तब साहित्य हमें आत्मविश्लेषण और आत्मसंवाद का अवसर प्रदान करता है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य का असली सौंदर्य उसकी संवेदनाओं, सृजनशीलता और प्रेम में है।
अंततः कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि यह भारत की आत्मा का दस्तावेज़ है। इसमें हमारी सभ्यता का इतिहास, हमारी संस्कृति का सौंदर्य, हमारे समाज की पीड़ा और हमारी आध्यात्मिक चेतना—सब कुछ समाहित है। यह हमें अतीत से जोड़ते हुए भविष्य की ओर अग्रसर करता है। भारतीय साहित्य का महत्व इस बात में है कि यह जीवन को केवल देखने का नहीं, बल्कि समझने और जीने का माध्यम बनता है। यही इसकी अनंत शक्ति और अमरता का प्रमाण है।
इस प्रकार भारतीय साहित्य मानवता की शाश्वत धारा है — जो समय, भाषा और सीमाओं से परे, सदैव जीवन को अर्थ, दिशा और सौंदर्य प्रदान करती रही है।

भारतीय साहित्य की विशेषताएं

भारतीय साहित्य विश्व के सबसे प्राचीन, समृद्ध और व्यापक साहित्यिक परंपराओं में से एक है। यह केवल विचारों और भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और समाज का जीवंत दर्पण भी है। भारतीय साहित्य में जीवन के प्रत्येक पहलू का चित्रण मिलता है — चाहे वह धर्म हो या दर्शन, राजनीति हो या प्रेम, कर्तव्य हो या भक्ति, नीति हो या नीति-विपरीतता। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यह सदैव मानवता, नैतिकता और सार्वभौमिकता के आदर्शों को केंद्र में रखता है। नीचे भारतीय साहित्य की प्रमुख विशेषताओं का विस्तृत वर्णन किया गया है —

1. प्राचीनता और निरंतरता

भारतीय साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राचीनता और अखंडता है। इसका आरंभ वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू.) से माना जाता है। ऋग्वेद विश्व की सबसे प्राचीन कविताओं का संग्रह है, जो मानवता के प्रारंभिक विचारों और अनुभूतियों का परिचायक है। समय के साथ यह साहित्य विकसित हुआ, पर इसकी मूल धारा — धर्म, सत्य, और जीवन के प्रति श्रद्धा — कभी नहीं टूटी। यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी भारतीय साहित्य अपनी पहचान और निरंतरता बनाए हुए है।

2. जीवन की संपूर्णता का चित्रण

भारतीय साहित्य में जीवन को केवल सुख-दुःख या धर्म-अधर्म की दृष्टि से नहीं देखा गया, बल्कि उसे समग्र रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ जीवन का प्रत्येक पक्ष — प्रेम, करुणा, संघर्ष, त्याग, वीरता, भक्ति, नीति, राजनीति, और समाज — साहित्य का अंग बना है।
महाकाव्यों रामायण और महाभारत में मनुष्य के प्रत्येक भाव, कर्म और संबंध का गहराई से चित्रण मिलता है। यही कारण है कि भारतीय साहित्य को “जीवन का दर्पण” कहा जाता है।

3. सार्वभौमिकता और मानवतावाद

भारतीय साहित्य केवल भारत तक सीमित नहीं है; यह समूचे मानव समाज के लिए उपयोगी है। यहाँ “वसुधैव कुटुंबकम्” (सारी पृथ्वी एक परिवार है) की भावना प्रमुख है। भारतीय कवियों और दार्शनिकों ने मानवता को सर्वोच्च मूल्य माना।
कबीर, तुलसी, नानक, और मीरा जैसे संतों ने यह सिखाया कि ईश्वर हर हृदय में वास करता है और मनुष्य को जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर बाँटा नहीं जा सकता। यह साहित्य हमें प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश देता है।

4. लोकभावना और जनसंपर्क

भारतीय साहित्य केवल उच्च वर्ग या विद्वानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आम जनता की भावनाओं और अनुभवों का भी प्रतिनिधित्व करता है। लोककथाएँ, लोकगीत, लोकनाट्य और लोककविताएँ भारतीय साहित्य की आत्मा हैं।
यह साहित्य लोकभाषाओं में लिखा गया, जिससे जन-जन तक पहुँचा। अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी, मराठी, बंगला, तमिल — सभी भाषाओं में लोकसाहित्य ने जीवन के सरल, सच्चे और भावनात्मक रूप को व्यक्त किया।

5. विविधता में एकता

भारत बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश है, फिर भी साहित्य में एकता का भाव है। चाहे संस्कृत में रचित गीता हो या तमिल में तिरुक्कुरल, चाहे हिंदी में रामचरितमानस हो या बंगला में गीतांजलि — सभी का मूल संदेश एक ही है: सत्य, प्रेम और मानवता।
इस विविधता ने भारतीय साहित्य को रंग, रूप और भावों से समृद्ध बनाया। प्रत्येक क्षेत्र, भाषा और युग ने अपनी विशिष्टता के साथ इस साहित्यिक परंपरा में योगदान दिया।


6. नैतिक और शिक्षाप्रद दृष्टिकोण

भारतीय साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन भी करता है। इसमें नैतिकता, सत्य, और कर्तव्य का अत्यंत महत्त्व है।
पंचतंत्र, हितोपदेश, नीतिशतक, और चाणक्य नीति जैसे ग्रंथ समाज को जीवन जीने की नीति और सदाचार सिखाते हैं। यहाँ साहित्य व्यक्ति को अच्छा मनुष्य बनने, न्यायप्रियता अपनाने और दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने की प्रेरणा देता है।

7. काव्य सौंदर्य और रसपरंपरा

भारतीय साहित्य में काव्य का विशेष महत्त्व रहा है। यहाँ काव्य को “रस” की दृष्टि से देखा गया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नौ रसों — शृंगार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, रौद्र, भयानक, बीभत्स और शांत — का उल्लेख मिलता है।
कालिदास, भवभूति, जयदेव, तुलसीदास, और बिहारी जैसे कवियों ने काव्य की सौंदर्यपरकता को उच्च शिखर तक पहुँचाया। उनके साहित्य में भाषा, भाव और लय का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

8. सामाजिक और सुधारात्मक दृष्टि

भारतीय साहित्य ने सदैव समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई है। आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे लेखकों ने समाज सुधार और राष्ट्रीय जागरण की दिशा में लेखन किया।
प्रेमचंद की कहानियों में किसान, मजदूर, और स्त्रियों की पीड़ा का चित्रण है। इस साहित्य ने समाज में समानता, शिक्षा, और स्वतंत्रता के महत्व को उजागर किया।

9. भाषाई समृद्धि

भारतीय साहित्य अनेक भाषाओं में लिखा गया है — संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, हिंदी, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु आदि।
हर भाषा ने अपने सांस्कृतिक परिवेश के अनुरूप साहित्यिक योगदान दिया। इस भाषाई विविधता ने भारतीय साहित्य को बहुआयामी और वैश्विक बना दिया।

10. भावनात्मक गहराई और संवेदनशीलता

भारतीय साहित्य की भाषा और भाव दोनों अत्यंत संवेदनशील हैं। इसमें मनुष्य के हृदय की सूक्ष्मतम भावनाओं — प्रेम, करुणा, दया, शोक, आशा, श्रद्धा और भक्ति — का सुंदर चित्रण मिलता है।
इसकी विशेषता यह है कि यह केवल भावनाओं को व्यक्त नहीं करता, बल्कि उन्हें आत्मा के स्तर पर अनुभूत कराता है।

11. आधुनिक चेतना और यथार्थवाद

स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक युग के आगमन के साथ भारतीय साहित्य में यथार्थवाद का विकास हुआ। अब साहित्य केवल आदर्शों का नहीं, बल्कि सामाजिक विषमताओं, राजनीतिक अन्याय, और आर्थिक संघर्षों का भी चित्रण करने लगा।
प्रेमचंद, यशपाल, अज्ञेय, मन्नू भंडारी, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम आदि ने आधुनिक मनुष्य के संकटों और संघर्षों को नई दृष्टि दी।

12. साहित्य का लोकहितकारी स्वरूप

भारतीय साहित्य में “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” की भावना निहित है। यह केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के कल्याण के लिए रचा गया है।
यह साहित्य मनुष्य को केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से भी समृद्ध बनाता है।

निष्कर्ष

भारतीय साहित्य का महत्व अत्यंत व्यापक और गहन है। यह केवल शब्दों का समूह या मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, संस्कृति, इतिहास और जीवन-दर्शन का जीवंत प्रमाण है।
भारतीय साहित्य की विशेषताएँ उसकी गहराई, व्यापकता और मानवीय संवेदनाओं में निहित हैं। यह साहित्य समय, भाषा और सीमाओं से परे है। इसमें धर्म की गंभीरता, दर्शन की गहराई, काव्य की मधुरता, और जीवन की सच्चाई — सब कुछ समाहित है। भारतीय साहित्य की विशेषता यह है कि यह हमें केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए प्रेरित करता है।
यह हमें बताता है कि जीवन का सार प्रेम, सत्य, करुणा और मानवता में है। इसीलिए भारतीय साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मा का संगीत है — जो युगों-युगों से मानवता को दिशा देता आ रहा है। इसमें धर्म, दर्शन, राजनीति, समाज, प्रेम, करुणा, वीरता, और भक्ति—सभी का सुंदर समन्वय मिलता है। भारतीय साहित्य मनुष्य को आत्मचिंतन, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।
धन्यवाद ! 



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