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कार्ल मार्क्स की मार्क्सवादी सिद्धांत की समीक्षा।

कार्ल मार्क्स की मार्क्सवादी सिद्धांत की समीक्षा। मार्क्स एक समाजवादी विचारक थे और यथार्थ पर आधारित समाजवादी विचारक के रूप में जाने जाते हैं। सामाजिक राजनीतिक दर्शन में मार्क्सवाद (Marxism) उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व द्वारा वर्गविहीन समाज की स्थापना के संकल्प की साम्यवादी विचारधारा है। मूलतः मार्क्सवाद उन राजनीतिक और आर्थिक सिद्धांतो का समुच्चय है जिन्हें उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में कार्ल मार्क्स, फ़्रेडरिक एंगेल्स और व्लादिमीर लेनिन तथा साथी विचारकों ने समाजवाद के वैज्ञानिक आधार की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया।  कार्ल मार्क्स का परिचय  कार्ल हेनरिख मार्क्स (जर्मन- Karl Heinrich Marx ; 5 मई 1818 - 14 मार्च 1883) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार, समाजशास्त्री, पत्रकार राजनीतिक अर्थव्यवस्था के आलोचक, समाजवादी क्रांतिकारी और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता थे।उनके सबसे प्रसिद्ध शीर्षक 1848 के पैम्फलेट "द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" और चार-खंड "दास कपिटल" (1867-1883) हैं। मार्क्स के राजनीतिक और दार्शनिक विचारों का बाद के बौद्धिक, आर्थिक और...

भारतीय साहित्य का महत्व

भारतीय साहित्य का अर्थ है भारतीय उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषाओं में रचित सभी प्रकार की लिखित और मौखिक रचनाएँ, जिनमें कविता, कहानी, नाटक और अन्य रचनात्मक कार्य शामिल हैं। यह दुनिया की सबसे पुरानी साहित्यिक परंपराओं में से एक है और इसमें संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, और अन्य कई भाषाओं के साहित्य भी शामिल हैं। भारतीय साहित्य वह विशाल और समृद्ध साहित्यिक परंपरा है, जो भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित काव्य, गद्य, नाटक, कथा, दर्शन, धर्म, इतिहास, और लोककथाओं का संगठित रूप है। यह साहित्य भारतीय सभ्यता, संस्कृति, समाज और मानव जीवन के विविध पहलुओं का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो — भारतीय साहित्य वह साहित्य है जो भारत की भाषाओं में लिखा गया हो यह भारत के उपमहाद्वीप में प्राचीन काल से लेकर अब तक, विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में रचित मौखिक और लिखित साहित्य को संदर्भित करता है और जिसमें भारतीय जीवन, संस्कृति, भावनाएँ, परंपराएँ और चिंतन झलकता हो। भारतीय साहित्य का महत्व भारतीय साहित्य विश्व के प्राचीनतम और समृद्धतम साहित्यिक परंपराओं में से एक है। इसका इतिहास हजारों वर्षों पु...

सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण की समीक्षा

सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण की समीक्षा सन् 1857 की क्रांति और पुनर्जागरण भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। क्रांति, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ विद्रोह था, जबकि पुनर्जागरण भारतीय समाज और संस्कृति में एक नई जागृति थी। दोनों ही समय काल में महत्वपूर्ण बदलावों के प्रतीक हैं। 1857 की क्रांति भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह था। इसे भारतीय इतिहास में 'पहला स्वतंत्रता संग्राम' भी माना जाता है और पुनर्जागरण 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज और संस्कृति में एक नई जागृति थी। यह एक ऐसा समय था जब भारतीय लोग पश्चिमी शिक्षा और विचारों से प्रभावित हुए और उन्होंने अपने समाज में सुधार करने का प्रयास किया। सन् 1857 ई. की राज्यक्रांति और पुनर्जागरण , स्वाधीनता आंदोलन ने साहित्य को जन चेतना की आधार भूमि प्रदान की। लगभग सभी भाषाओं के साहित्यकारों ने युग चेतना को गद्य और पद्य के माध्यम से आवाज दी। 1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात समाज में जो सन्नाटा व्याप्त हुआ, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए साहित्यकारों ने जन भावनाओं को माध्यम बनाया। प्रत्येक व्यक्...

कहानी तत्वों के आधार पर परिंदे कहानी की समीक्षा

कहानी तत्वों के आधार पर परिंदे कहानी की समीक्षा निर्मल वर्मा की परिंदे कहानी एक उत्कृष्ट रचना है जो पाठक को भावुक और विचारशील बनाती है। इस कहानी का तात्विक विश्लेषण हमें इसके विभिन्न आयामों को समझने में मदद करता है। यह कहानी हमें जीवन के सार को समझने में मदद करती है और हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करती है। प्रेमचन्द के पश्चात् जैनेन्द्र और अज्ञेय तक आते-आते हिन्दी कहानी अन्तर्मुखी हो चुकी थी और उसमें पुरुष के साथ-साथ (बल्कि उससे भी अधिक) नारी-मन को चित्रित किया जाने लगा था। नये युग के कहानीकारों ने इस प्रवृत्ति को और भी अधिक आगे बढ़या। श्री राजेन्द्र यादव 'एक दुनिया समानान्तर' ने इस सम्बन्ध में ठीक कहा है "जिन्दगी में सभी कुछ मधुर-मृदुल या 'गुड़ी-गुडी' नहीं होता, मजबूरियाँ भी हैं, विद्रोह भी हैं और सबकी जिन्दगियाँ एक-दूसरे से उलझी-बँधी भी हैं। कभी उसे (नारी को) शरीर की माँग झुका देती है तो कभी अकेलेपन की यातना।" इस अकेलेपन की यातना को मुखर करने वाले प्रमुख कथाकारों में से एक प्रमुख नाम है-निर्मल वर्मा और प्रमुख कहानी है-' परिंदे '। प...

स्त्री विमर्श का आशय एवं उद्देश्य

स्त्री विमर्श का आशय एवं उद्देश्य मनुष्य समाज जिन दो पहियों के बल पर अपनी जीवन यात्राा करता है वे पहिए हैं-पुरुष और महिला नर और नारी। दोनों न केवल एक-दूसरे के पूरक हैं, बल्कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही सम्भव नहीं। इनमें एक श्रम है, दूसरी उस श्रम की प्रेरणा-शक्ति। एक बाहरी परिवेश का नियंता है तो दूसरी आंतरिक और घरेलू मोर्चे की अधिष्ठात्री। लेकिन दोनों के आपसी सम्बन्धों के बीच समानता के संतुलन का अभाव साफ-साफ दिखाई देता है। पुरुष सदैव महिला को अपने अधीन रखता है। सभी महिलाओं को एक समूह के रूप में देखें तो संसार के लगभग सभी देशों में वे समाज का कमजोर हिस्सा रही हैं। स्त्री विमर्श का आशय  स्त्री विमर्श , स्त्री मुक्ति , स्त्रीवादी आंदोलन आदि पर विचार विमर्श किया जाए तो इनके मूल में स्त्री के अस्तित्व, मौलिक अधिकार और उसकी मुक्ति के प्रश्न हैं। स्त्री विमर्श हम साहित्य में या मंचों पर करते हैं इसलिए इसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा देना मुश्किल कार्य है। यह पूरी तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आदि संस्थाओं की सोच के परिणाम स्वरूप उनके विचारों की अभिव्यक्ति है। स्त्री विमर्श में '...

हिन्दी का आधुनिक विकास और राजभाषा हिंदी की स्थिति

हिन्दी का आधुनिक विकास हिंदी भाषा का आधुनिक विकास 1850 ईस्वी के बाद शुरू हुआ, जिसे हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भी कहा जाता है. इस काल में हिंदी भाषा और साहित्य ने अनेक पड़ावों से गुजरा, जिसमें गद्य और पद्य दोनों रूपों में विकास हुआ. इस दौरान राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता संग्राम, और संचार साधनों के विकास जैसे सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का हिंदी साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस काल में राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। इसके लिए शृंगारी ब्रजभाषा की अपेक्षा खड़ी बोली उपयुक्त समझी गई। समय की प्रगति के साथ गद्य और पद्य दोनों रूपों में खड़ी बोली का पर्याप्त विकास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली के दोनों रूपों को सुधारने में महान प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा द्वारा हिन्दी साहित्य की सम्यक संवर्धना की। विक्रमी संवत् 1800 के उपरान्त भारत में अनेक यूरोपीय जातियाँ व्यापार के लिए आईं। उनके सम्पर्क से यहाँ पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव पड़ना प्रारम्भ हुआ। विदेशियों ने यहाँ के देशी राजाओं की पारस्परिक फूट से लाभ उठाकर अपने पैर जमाने में सफलता प्राप्त की...

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छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति Art and Culture of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ की महान कला एवं संस्कृति कला , संस्कृति की वाहिका है जिस प्रकार भारत की कला में भिन्नता है उसी प्रकार छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति भी बहुआयामी है वनों से आच्छादित व आदिवासी अधिकता के कारण यहां की कला में वनों , प्रकृति , प्राचीन और परम्परा का विशेष स्थान व महत्व है। छत्तीसगढ़ की कला में हमें विभिन्न प्रकार के लोक नृत्य , जातियां , लोक कला , मेले , विभिन्न भाषा , शिल्प और विशेष व्यंजन देखने को मिलते हैं। प्रदेश में यहां के आभूषणों , वस्त्रों का विशेष स्थान है जो यहां की संस्कृति को और प्रभावशाली व समृद्ध बनाती हैं सरल जीवन जीते हुए यहां के लोग अपनी परम्परा , रीति रिवाज और मान्यताओं का पालन करते है। समय-समय पर ऋतुओं , तिथि और त्योहार अनुसार विभिन्न उत्सवों और संस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है प्रत्येक गांव, जिले, क्षेत्र की अपनी अलग मान्यताएं, पहचान व धार्मिक महत्व हैं। माना जाता है कि कला का प्राण है रसात्मकता। रस अथवा आनन्द अथवा आस्वाद्य। कला के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संस्कृति व परम्पराओं का प्रदान होता है छत्तीसगढ़ की कला जहाँ एक ओर त...

Top Ten Best Chhattisgarhi Songs 2021 ( CG song ) , छत्तीसगढ़ के 10 सबसे प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गाने

छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य होने के साथ-साथ इसकी एक अलग फिल्म इंडस्ट्री भी है। जो दिन-प्रतिदिन सफलता के नए आयामों को छू रही है। कोई भी इंडस्ट्री गानों के बिना अधूरी है छत्तीसगढ़ भी इसमें पीछे नहीं है छत्तीसगढ़ ने ऐसे कई गाने दिए हैं जो किसी भी बड़े इंडस्ट्री के गानों को भी टक्कर दे सकती हैं। दिन प्रतिदिन छत्तीसगढ़ी गाने प्रसिद्ध होते जा रहे है और लोग इन्हें सुनना पसंद करते हैं चाहे वह लव सोंग्स हो या डीजे संगीत या कोई और छत्तीसगढ़ी गाने समा बांध देते है। इस लेख में हम छत्तीसगढ़ के Top Ten CG Song के बारे में जानेंगे। 1 . मोला नीक लागे रानी ( 115 M. ) छत्तीसगढ़ का पहला गीत जिसे यूट्यूब पर 100 मिलियन से भी अधिक बार देखा गया “मोला निक लागे रानी” छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध सॉन्ग है आते ही इसने सभी के दिलो में अपनी खास जगह बना ली। Song : Mola Nik Lage Rani YouTube View : 115 M. + Channel : SB MUSIC KORBA Likes : 1.3 Lakh + Singer : Ashok Rajwade , Suman Kurrey 2 . छम छम बाजे पांव के पैरी ( 7 3 M . ) छत्तीसगढ़ी फिल्म आई लव यू का सुपर हिट सॉन्ग “छम छम बाजे पांव...

छत्तीसगढ़ के त्यौहार , उत्सव , मेले व स्वादिष्ट पकवान व व्यंजन Art and Culture of Chhattisgarh Part : 2 भाग - दो

विश्व प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ की लोक कला एवं संस्कृति छत्तीसगढ़ के आम जनजीवन का एक अभिन्न अंग है यह लेख “ छत्तीसगढ़ के त्यौहार , उत्सव , मेले व स्वादिष्ट पकवान व व्यंजन Art and Culture of Chhattisgarh Part : 2 भाग - दो ” छत्तीसगढ़ के कला संस्कृति के वर्णन का भाग 2 है आप छत्तीसगढ़ की कला व संस्कृति पर क्लिक कर कर इसके लेख भाग 1 को पढ़ सकते हैं। इस लेख में छत्तीसगढ़ में बड़े ही धूमधाम से मनाए जाने वाले विभिन्न उत्सवों , प्रमुख मेलों व आयोजनों और स्वादिष्ट पकवानों के बारे में जानकारी दी गई है। छत्तीसगढ़ के उत्सव भारत विभिन्न त्योहारों का देश है जहां अलग-अलग समय और ऋतुओं के अनुसार विभिन्न त्योहार मनाए जाते हैं इसके पीछे कई प्रमुख कारण है जिस प्रकार भारत में त्योहारों की विविधता है उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में भी विभिन्न त्योहार मनाये जाते हैं। छेरछेरा - छेरछेरा छत्तीसगढ़ के सबसे प्रमुख त्योंहारों में से एक है जो किसानी काम खत्म होने के बाद फसलों को अपने-अपने घर लाये जाने का प्रतीक है यह त्योहार पोष मास के पूर्णिमा को मनाया जाता है तथा इस त्योहार का अन्य नाम पूष पुन...